Friday, February 23, 2018
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दुर्गा पूजा में संधि पूजा सबसे महत्वपूर्ण होती है। महाष्टमी के दिन संधि पूजा होती है। मां दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहते हैं जिसका अर्थ है असुरों का नाश करने वाली। संधि पूजा का अर्थ है महाष्टमी का अंत और महानवमी की शुरूआत। इस क्षण को संधिक्षण कहते हैं।


महाष्टमी के अंतिम चैबिस मिनट और महानवमी के पहले चैबिस मिनट को संधिक्षण कहते हैं। यह वह समय है जब मां दुर्गा ने चंड और मुंड नामक दो असुरों का वध किया था। इसीलिए प्रति वर्ष संधि पूजा अष्टमी और नवमी के संधि काल में होता है। पंचांग के अनुसार प्रति वर्ष यह समय बदलता रहता है। कभी तो यह सुबह आठ बजे पड़ता है, कभी दोपहर तीन बजे, कभी शाम छः या आठ बजे, या रात्रि बारह बजे। कभी कभी तो मध्य रात्रि के बाद भोर तीन या चार बजे। कहने का तात्पर्य है कि चैबिस घंटे में कभी भी। इस वर्ष ; 2016द्ध का संधि पूजा 9जी अक्तूबर रविवार को शाम 5ण्10 से 5ण्58 तक है।

मान्यता है कि जब मां दुर्गा महिषासुर के सामने आई थीं तो वह एक बेहद सुंदर सुनहरे रंग की युवती की तरह दिख रही थीं, उनकी त्वचा सुनहरे रंग की थी और उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहनी थी। उनके दस हाथों में अलग अलग प्रकार के दस शस्त्र थे। जब मां दुर्गा और महिषासुर के मध्य युद्ध चल रहा था, तभी महिषासुर के चेले चंड और मुंड ने मां दुर्गा पर पीछे से प्रहार किया। युद्ध के नियमों को तोड़ने के लिए मां दुर्गा इतनी क्रोधित हुईं कि उनका चेहरा नीला हो गया। उन्होने अपना तीसरा नेत्र खोला और चामुंडा अवतार में आ गईं। यह अवतार मां काली का ही एक रूप है। चामुंडा ने चंड और मुंड का अंत कर दिया।

संधि पूजा में मां दुर्गा के चामुंडा रूप की पूजा होती है। संधि पूजा का आयोजन भव्य होता है। उसमें 108 कमल के पुष्प और 108 मिट्टी के दीए अति आवश्यक है। इसके अलावा एक लाल साबुत फल,लाल गुड़हल के फूल,साड़ी, कच्चे चावल के दाने, बेल के पत्ते भी पूजा में प्रयोग किए जाते हैं। संधि पूजा के दौरान मां दुर्गा दो मालाएं पहनती हैं एक. 108 लाल गुड़हल के फूलों की और दूसरी दृ 108 बेल के पत्तों की। संधि पूजा के बाद लाल गुड़हल के फूल और बेल के पत्तों की माला पहने मां का रूप दिव्य होता है। मां की प्रतिमा चामुंडा रूप में नहीं होती है लेकिन दुर्गा रूप की प्रतिमा के मुख से ही चामुंडा का तेज और दिव्य आभा निकलता है। मां का यह रूप देखने लायक होता है। एक और चीज अनिवार्य होती है संधि पूजा के दौरान , वह है ढ़ाक। संधि पूजा के दौरान ढ़ाक पर पड़ने वाली थाप भी अलग होती है।
संधि पूजा के बाद मां के मुख पर जो तेज होती है वह केवल मुख पर ही नहीं दिखती, वह उनके अंदर से आती है क्योकि मां को उनके अंदर की शक्ति का आभास था । कहा जाता है कि हर नारी में देवी का तेज है , फिर भी उसे अत्याचार सहना पड़ता है क्योंकि उसे अपने अंदर की शक्ति का आभास नहीं है जिस दिन उसे यह आभास हो जाएगा उस दिन आज प्थ्वी पर खुले घूम रहे महिषासुरों का अंत देवी दुर्गा का अंश आज की नारी करेगी और वह आभास भी एक दिन नारी को अवश्य होगा या यों कहें कि उसे अपने अंदर के तेज को समझना ही होगा।

 

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