Tuesday, December 12, 2017
User Rating: / 0
PoorBest 

दुर्गा पूजा का अभिन्न अंग कुमारी पूजा

 

दुर्गा पूजा कुमारी पूजा के बिना अधूरी है यह सत्य है। जहां जहां दुर्गा पूजा होती है वहां वहां कुमारी पूजा होती है। पश्चिम बंगाल स्थित बेलूर मठ की दुर्गा पूजा बहुत लोकप्रिय है। उसकी लोकप्रियता को वहां होने वाली कुमारी पूजा और भी बढ़ाती है। सन् 1902 में स्वामी विवेकानंद ने पहली बार बेलूर मठ में कुमारी पूजा की थी।


1902 में स्वामी विवेकानंद ने पहली बार मठ के प्रांगण में नौ कुमारी कन्याओं की पूजा की थी। मंडप में शारदा मां की उपस्थिती में उन्होंने नौ कुमारी कन्याओं के पैरों पर पुष्पांजली अर्पित की, उन्हें मिठाई और दक्षिणा दी। पूजा संपन्न होने के बाद स्वामी विवेकानंद ने नौ कुमारी कन्याओं के पांव छूए। बाद में उन्होंने ध्यान और मंत्र के द्वारा शारदा मां की पूजा देवी दुर्गा के रूप में की।
मां दुर्गा हर वर्ष धरती पर अपने चारों संतान लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश को लेकर चार दिन के लिए आती हैं। या यूं कहें कि हर ब्याहता बेटी की तरह वह भी हर साल अपने बच्चों को लेकर अपने मायके आती हैं। देवी दुर्गा अपने इस प्रवास के दौरान विभिन्न रूपों में पूजी जाती हैं। इनमें से एक है कुमारी रूप।
देवी दुर्गा को हमेशा ही शक्ति की देवी के रूप में पूजा जाता है। कुमारी रूप महाशक्ति का सबसे शक्तिशाली रूप है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि कुमारी कन्या के तेज से बचो। एक अद्भुत तेज और शक्ति होती है कुमारी कन्याओं में। 
कुमारी कन्या की पूजा देवी दुर्गा के सामने बैठाकर की जाती है। एक वर्ष से सोलह वर्ष तक की कन्याओं की पूजा देवी के कुमारी रूप में होती है। उम्र के अनुसार इन कन्याओं की पूजा देवी के विभिन्न रूपों में होती है। एक वर्ष की कन्या की पूजा देवी के संध्या रूप में होती है। दो वर्ष की कन्या की पूजा देवी के सरस्वती रूप में होती है। दुर्गा के त्रिधा रूप में तीन वर्ष की कन्या की पूजा होती है। चार वर्ष की कन्या की पूजा देवी के कालिका रूप में होती है। पांच और छः वर्ष की कन्या की पूजा क्रमशः दुर्गा के सुभागा और उमा के रूप में होती है। सात वर्ष की कन्या देवी के मालिनी रूप में तो आठ वर्ष की कन्या की पूजा कुज्जिका के रूप में होती है। दस और ग्यारह वर्ष की कन्या कालसंदर्भ और अपराजिता। बारह वर्ष की कन्या भैरवी और तेरह वर्ष की कन्या महालक्ष्मी।पितनायिका, खेत्राग्या और अम्बिका का प्रतिनिधित्व क्रमशः चैदह, पन्द्रह और सोलह वर्ष की कन्या करती है।

कुमारी पूजा अष्टमी या कभी कभी नवमी के दिन होता है। कुमारी पूजा अन्नपूर्णा ,जगत्धात्री और काली पूजा में भी होती है क्योकि कुमारी पूजा के बिना यज्ञ संपूर्ण नहीं होता है। अष्टमी या नवमी के दिन प्रातः काल कन्या गंगा जल से स्नान करती है। इसके उपरांत उसे लाल बनारसी साड़ी पहनाया जाता है और उसका श्रंगार फूलों और गहनों से किया जाता है। उसके पैरों में आलता लगाया जाता है और माथे पर सिंदूर का तिलक। वह देवी के सामने एक सजे हुए आसन पर बैठती है और देवी के हाथों से एक पुष्प लेकर कन्या के हाथों पर रखा जाता है। उसके सामने फूल, बेल पत्र, अगरबत्ती, दीया इत्यादि पूजा के लिए आवश्यक चीजें रखी जाती हैं। पुरोहित मंत्र पढ़ते हैं और ढ़ाक की आवाज संपूर्ण वातावरण में छा जाती है।

कहा जाता है कि कुमारी पूजा के पश्चात देवी दुर्गा की ज्योती कन्या के चेहरे पर दिखती है। कन्या को दक्षिणा में सोना, चांदी, कपड़े दिए जाते हैं। कुमारी को दक्षिणा देना बहुत पवित्र माना जाता है। 
कुमारी पूजा की परंपरा आज से नहीं, यह कब शुरू हुई कोई नही जानता। श्री रामकृष्ण परमहंस देव कहते थे कि कुमारी देवी दुर्गा का ही एक रूप है। वह स्वयं शारदा मां की कुमारी के रूप में पूजा करते थे। शारदा मां रामकृष्ण परमहंस देव की पत्नी थीं लेकिन उनका विवाह केवल मंत्रों द्वारा ही सम्पन्न हुआ था। उन दोनों के बीच में कभी भी पति पत्नी का रिश्ता नहीं बना। रामकृष्ण देव शारदा मां को मां कहते थे। महाभारत में अर्जुन ने कुमारी पूजा की थी। पुराणों में भी चंडिका के कुमारी रूप का वर्णन है।

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

culture

Who's Online

We have 2375 guests online
 

Visits Counter

756927 since 1st march 2012