Tuesday, December 12, 2017
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devlok plant

पारिजात को देवलोक का वृक्ष कहते हैं। पारिजात नाम सुनने से ही लगता है कि वह पृथ्वीलोक का नहीं बल्कि स्वर्ग का हो। उस पुष्प की नैसर्गिक सुंदरता इस बात को प्रमाणित भी करती है। देव देवियों के अति प्रिय होने के कारण ही इस पुष्प को हरसिंगार का पुष्प भी कहते हैं।


पारिजात के वृक्ष के देवलोक पहुंचने की एक कथा है।
परिजात का वृक्ष समुद्र मंथन के दौरान निकला था जो बाद में देवराज इंद्र के उद्यान नंदन कानन की शोभा बनी। यह तो हुई इसके स्वर्गलोक पहुंचने की कहानी। पारिजात पुष्प के मर्तलोक में पहुंचने की कहानी भी बहुत रोचक है और यह माखन चोर श्री कृष्ण से जुड़ी है।

श्री कृष्ण अपनी पत्नी सत्याभामा के साथ गरूड़ पर विराजमान होकर इंद्रलोक भ्रमण करने हेतु उपस्थित हुए। वहां पहुंचने के बाद केवल देवराज इंद्र ने इनका स्वागत किया। देवराज इंद्र के आग्रह पर ही कृष्ण और सत्यभामा नंदन कानन का भ्रमण करने निकल पड़े। भ्रमण के दौरान सत्यभामा की नजर पारिजात के वृक्ष पर पड़ी। वह पारिजात पुष्प देखकर उसकी सुंदरता पर मोहित हो गई और इस पुष्प के विषय में जानने का आग्रह किया। श्री कृष्ण ने बताया कि यह वृक्ष समुद्र मंथन के दौरान निकला था। इस बात पर सत्यभामा बोलीं इसका मतलब यह वृक्ष इंद्र की निजी संपत्ति नहीं हो सकती। इसका आनंद सबको उठाने का अधिकार है। सत्यभामा बोली इसे हम अपने साथ पृथ्वी पर ले जाएंगे। इसे मैं द्वारिका में अपने बगीचे में लगाऊंगी और वहां के लोगों को दूंगी। यदि अन्य स्थानों के लोग इस पुष्प का आनंद उठाना चाहेंगे तो उन्हें भी यह दूंगी। कृष्ण ने कहा उचित है और पारिजात वृक्ष को जड़ से उखाड़कर गरूड़ के पीठ पर रखकर धरती पर रवाना होने को हुए। 
तभी इंद्र के द्वारपाल दौड़ते हुए वहां पहुंचे और बोले कि यह वृक्ष आप लोग अपने साथ नहीं ले जा सकते। यह हमारी रानी इंद्राणी का है। इसके बाद दोनो पक्षों में बहस होने लगी। द्वारपाल ने कृष्ण को मनुष्य समझकर धमकी दी कि सभी देव इंद्र के साथ आकर तुमसे युद्ध करेंगे और तुम हार जाओगे। सत्यभामा ने उनसे कहा कि जाकर कह दो इंद्र को कि हम पारिजात लेकर जा रहे हैं। यदि उनमें क्षमता हो तो वह कृष्ण से लड़ें।
द्वारपाल ने जाकर इंद्र और इंद्राणी को यह घटना बताई। इंद्राणी सत्यभामा पर बेहद क्रोधित हुईं और कहा कि कृष्ण जो भी हो इस वक्त एक मनुष्य हैं। इंद्राणी ने इंद्र से कृष्ण और सत्यभामा को सबक सिखाने के लिए कहा। इंद्र अपनी समस्त सेना और तैंतिस करोड़ देवता को साथ लेकर कृष्ण से लड़ने पहुंचे। कृष्ण ने इंद्र की समस्त सेना, सभी देवतागणों को परास्त कर दिया। अब केवल इंद्र अपने वज्र के साथ खड़े थे। इंद्र ने कांपते हाथों से कृष्ण पर वज्र से प्रहार किया। वज्र आग में परिवर्तित होने के स्थान पर बरफ बन गया। अब इंद्र हारे हुए निहत्थे खड़े थे और भागने लगे।
यह देखकर सत्यभामा हंस पड़ी और विद्रुप करते हुए इंद्र से कहा कि आप अपना पारिजात अपनी पत्नी के पास ले जाइए। हमारी इसको ले जाने की कोई इच्छा नहीं है। मैंनें तो यह सब कुछ आपकी पत्नी को सबक सिखाने के लिए किया था। हम आप के मेहमान बनकर आए लेकिन आपकी पत्नी हमारा स्वागत करने तक के लिए बाहर नहीं आई।कृष्ण ने भी इस बात का समर्थन किया और पारिजात वृक्ष इंद्र को लौटा लेने के लिए कहा।

इंद्र ने माफी मांगी और इंद्राणी की तरफ से भी माफी मांगी। पारिजात वृक्ष कृष्ण को धरती पर ले जाने के लिए पुनः आग्रह किया। कृष्ण केे न मानने पर इंद्र ने कहा कि आप पारिजात वृक्ष को अपने साथ पृथ्वीलोक पर ले जाइए और जब आप वहां से अपना उद्देश्य पूर्ण करके वापस स्वर्गलोक लौटें तब मूल पारिजात वृक्ष अपने साथ देवलोक ले आइएगा। माखन चोर मान गए और अपनी चिर परिचत मुस्कान के साथ गरूड़ की पीठ पर सत्यभामा और पारिजात वृक्ष को अपने साथ लेकर द्धारिका की ओर चल पड़े।यह तो हुई पारिजात वृक्ष की पृथ्वी पर आने की कहानी। जब तक मूल पारिजात वृक्ष पृथ्वीलोक में रहा तब तक में यह संपूण धरती पर फैल चुका था और इसीलिए हम आज भी इस पुष्प का आनंद उठा सकते हैं।

पारिजात के वृक्ष बनने की एक रोचक कथा है।राजकुमारी पारिजात सूर्य देव से प्रेम करती थी। सूर्य देव ने विवाह के लिए एक शर्त रखी कि राजकुमारी उन्हे छोड़कर कभी नहीं जाएगी। राजकुमारी मान गई। उनका विवाह शरद ऋतु में हुआ। देखते देखते शीत और बसंत ऋतु बीतकर ग्रीष्म ऋतु आ गई। सूर्य देव की तपिश बढ़ने लगी और पारिजात के लिए सूर्य देव के निकट जाना असंभव होने लगा। एक दिन दोपहर के वक्त सूर्य पारिजात के कक्ष में आए। पारिजात पल भर के लिए दूर हट गई। क्रोधित होने के कारण सूर्य की तपिश और बढ़ गई जिससे पारिजात बिल्कुल मुरझा गई और उसकी मृत्यु हो गई । अब सूर्य को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होने सभी देवों से सहायता मांगी। देवों को यह मालूम था कि पारिजात सूर्य से कितना प्रेम करती है। इसलिए देवों ने पारिजात को वृक्ष के रूप में एक नया जन्म दिया। इसके बाद से आज भी सूर्य रात को पारिजात से मिलने आते हैं। आज भी दिन में पारिजात वृक्ष सूर्य की तपिश बर्दाश्त नहीं कर सकती इसलिए पृथ्वी पर सूर्य की प्रथम किरण के साथ ही पारिजात के पुष्प वृक्ष से टूटकर धरती पर गिर जाती है। गिरने के बाद भी उसकी सुंदरता और सुगंध में कोई फर्क नहीं आता क्योंकि सूर्य के स्पर्श से पारिजात पुष्प में नैसर्गिक सुंदरता और सुगंध आ जाती है। यह हुई राजकुमारी पारिजात के पुष्प पारिजात बनने की कथा।
पारिजात पुष्प दूसरे पुष्पों से कुछ अलग है। पारिजात के पुष्प को कोई भी वृक्ष से तोड़ नहीं सकता। उसे जमीन से बीनना पड़ता है और जमीन से उठाकर बिना धोए पारिजात पुष्प भगवान को अर्पित किया जा सकता है। ऐसा दूसरे पुष्पों के साथ नहीं हो सकता। कथा के अनुसार पारिजात के प्रेमी सूर्य हैं परंतु आज पारिजात पुष्प से प्रत्येक पुष्प प्रेमी प्रेम करते हैं।

 

 

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