Tuesday, January 16, 2018
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पंाच दिवसीय दिपावली पर्व का पहला दिन धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। धनतेरस ज्यादातर भारत के उत्तरी और पश्चिमी भागों में मनाया जाता है। धनतेरस को धनत्रयोदशी या धनवंतरीत्रयोदशी भी कहते हैं। यह कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष के तेरहवें दिन पर होता है।


धनतेरस पर धन दौलत, समृद्धि के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा होती है। व्यापारी समुदाय के लिए धनतेरस का विशेष महत्व है। धन दौलत के देवता भगवान कुबेर को भी देवी लक्ष्मी के साथ इस दिन पूजा जाता है। 
धनतेरस के दिन शाम को दीया जलाकर धन लक्ष्मी का घर में स्वागत किया जाता है। लक्ष्मी के स्वागत के लिए मुख्य द्वार से पूजा घर तक रंगोली बनाई जाती है। आरती और भक्ति गीत गाया जाता है एवं देवी लक्ष्मी को फल, मिठाई चढ़ाई जाती है। लोग इस दिन सोने, चांदी के गहने या पीतल, तांबा के बर्तन खरीदते हैं। परंतु महंगाई के कारण आजकल ज्यादातर लोगों को स्टील के बर्तन से ही संतोष करना पड़ता है। दिपावली का पहला दीया जलाने के लिए बहुत लोग नए कपड़े तथा गहने पहनते हैं। कुछ लोग जूआ भी खेलते हैं जो बुरी प्रथा है। 
हम धनतेरस मनाते हैं लेकिन क्या आप इसके पीछे की कहानी को जानते हैं।यह कहानी बहुत पुरानी और रोचक है। राजा हीमा का एक सोलह वर्षीय पुत्र था। उसके भाग्य में अपने विवाह के चैथे दिन सांप के काटने से मृत्यु लिखी थी। उस दिन उसकी नव विवाहित दुल्हन ने तय किया कि वह अपने पति को पूरी रात सोने नहीं देगी। उसने शयन कक्ष के प्रवेश द्वार पर अपने सारे गहने, सोने और चांदी के सिक्को का ढ़ेर रख दिया और कमरे में दीयों को जलाए रखा। इसके पश्चात पति को जगाए रखने के लिए कहानी सुनाए और गीत गाए। रात को मृत्यु के देवता यम सांप का रूप धरकर आए। उनकी आंखें गहनों और सिक्कों की चमक तथा दीयों की रोशनी से चैंधिया गई। वह कमरे में प्रवेश नहीं कर पाए इसलिए सिक्कों के ढ़ेर पर चढ़कर बैठ गए और पूरी रात कहानी और गाने सुनते हुए बिता दिए। सुबह होते ही वह चुपचाप चले गए। इस तरह नई नवेली दुल्हन की चतुराई के कारण राजकुमार मृत्यु के पंजे से बच गए। यही दिन धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। 
एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार जब देवता और राक्षसों ने समुद्र मंथन किया था तब अमृत का कलश लेकर धनतेरस के दिन देवताओं के चिकित्सक धनवंतरी प्रकट हुए थे।
धनतेरस के दिन व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सजाया जाता है। धन और समृद्धि की देवी के स्वागत के लिए मुख्य द्वार पर पारंपरिक रंगोली बनाई जाती है। पूरे घर में चावल के आटे और सिंदूर से देवी लक्ष्मी के छोटे छोटे पद चिन्ह बनाए जाते हैं और दीये सारी रात जलते हैं। 
धनतेरस के त्यौहार पर अमीर लोग सोने, चांदी के गहने,वाहन,खरीदते हैं। वहीं गरीब भी अपनी हैसियत के अनुसार स्टील का कोई छोटा मोटा बर्तन अवश्य खरीदते हैं। इस दिन पर कोई धातु खरीदना शुभ माना जाता है। धनतेरस का त्यौहार बेहद जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। शाम को लक्ष्मी की पूजा होती है, बुरी आत्माओं को दूर करने के लिए मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं, भक्ति संगीत गाया जाता है और देवी लक्ष्मी को नैवेद्य अर्पित किया जाता है। 
गावों में बैलों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है जो किसानों की कमाई का मुख्य जरिया हैं। धनतेरस को हम धन का त्यौहार भी कह सकते हैं।

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