Saturday, November 25, 2017
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shiv ling with bel patra

भोलेनाथ तो भोलेनाथ ही हैं अल्प में ही संतुष्ट हो जाने वाले। यूं तो भगवान को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या के साथ साथ भोग प्रसाद चढ़ाना पड़ता है फिर भी भगवान से वरदान पाना बहुत ही मुशिकल होता है। भोलेनाथ तो ठहरे औघढ़ दानी ।भक्त जल और बेलपत्र से निष्ठा तथा भकित के साथ इनकी पूजा करे तो भक्त जो मांगे भगवान शिव उसे देते हैं ऐसी मान्यता है। जल और बेलपत्र भगवान शिव को बहुत प्रिय हैं लेकिन क्यों ? उसका जवाब पुराणों में मिलता है।


सागर मंथन के समय हालाहल नामक विष निकलने लगा था। विष के प्रभाव से सभी देवता और पशु-पक्षी परेशान हो उठे। तब भगवान शिव ने वह विष पी लिया। उन पर भी विष का प्रभाव न हो इसलिए उन्होने विष को निगला नहीं बलिक उसे अपने कंठ में रख लिया। इस तरह उनके कंठ का रंग नीला हो गया और भगवान शिव नीलकंठ कहलाने लगे। लेकिन विष का कुछ प्रभाव तो होना ही था।

विष के प्रभाव से और कुछ तो नहीं हुआ परंतु भगवान शिव का मसितष्क गर्म होने लगा। तब देवता क्या करते भोलेनाथ के मसितष्क को ठंडा करने के लिए उन्होने जल उड़ेलना प्रारंभ किया। इससे शिव जी के मसितष्क को थोड़ी राहत मिली।

बेलपत्र यानि बेल के पत्ते हम सभी शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। पर क्या आपको मालूम है क्यों चढ़ाते हैं। जब विष के प्रभाव से महादेव का मसितष्क गर्म होने लगा तो जल के अलावा बेलपत्र भी चढ़ाया गया क्योंकि बेल के पत्तों की तासीर ठंडी होती है।मसितष्क पर जल और बेलपत्र चढ़ाने से उन्हें शीतलता मिली। तभी से भगवान शिव की पूजा जल और बेलपत्र से होने लगी। महादेव को जल और बेलपत्र बहुत प्रिय हैं। इसलिए जब शिवभक्त शिवलिंग पर जल और बेलपत्र चढ़ाते हैं तो भोले बाबा खुश हो जाते हैं और भक्त की मनोकामना भी पूरी करते हैं। हां जल और बेलपत्र के साथ एक चीज बहुत आवश्यक है , वह है भकित। इसके न होने पर जितने लीटर जल चढ़ाएं या बेल के पेड़ के सारे पत्ते भोले बाबा प्रसन्न नहीं होंगे।

 

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