Monday, November 20, 2017
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उत्तराखंड में बाढ़ से मची तबाही से कोई अनजान नहीं है। केदारनाथ धाम भी पूरी तरह बरबाद हो गया। मंदिर परिसर का एक हिस्सा बह गया है परंतु मंदिर का मुख्य भाग जहां भगवान केदारनाथ का निवास है उसको कुछ क्षति पहुंची लेकिन यह आज भी खड़ा है। उत्तराखंड के मुख्य मंत्री श्री विजय बहुगुणा ने 19 जून 2013 को घोषणा की कि मंदिर के चारों ओर के मलबे को साफ करने के लिए केदारनाथ मंदिर एक साल के लिए बंद रहेगा।

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यह दुख की बात है परंतु पर्यावरण इंसान को कुछ तो सजा देगी। आईए केदारनाथ मंदिर के बारे में जानें। केदारनाथ मंदिर गढ़वाल के उपरी भाग में हिमालय पर्वत श्रंखला में मंदाकिनी नदी के निकट सिथत है। उत्तराखं डमें सिथत केदारनाथ का यह मंदिर भारत का गौरव है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर हिंदुओं के पवित्र मंदिरों में से एक होने के साथ साथ बड़ा तीर्थस्थल भी है और भारत के हिस्से वाले उत्तरी हिमालय सिथत उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में छोटा चार धाम के नाम से चार तीर्थ स्थल प्रसिद्ध है।इसमें केदारनाथ के अलावा यमुनोत्री, गंगोत्री और बद्रीनाथ शामिल है। यहां के मौसम को देखते हुए केदारनाथ मंदिर अप्रैल के अंत से कार्तिक पूर्णिमा तक ही खुला रहता है। शीत ऋतु के दौरान देवताओं को केदारनाथ मंदिर से उखीमठ लाया जाता है और छह: महीने तक वहीं उनकी पूजा होती है।

केदारनाथ मंदिर में भगवान शिव को केदारनाथ के नाम से पूजा जाता है क्योंकि यह इस क्षेत्र का ऐतिहासिक नाम है। केदारनाथ का अर्थ है केदार खंड के देव। यह बारह जोर्तिलिंगों में से एक है और मानयता है कि वर्तमान मंदिर का निर्माण आदि शंकराचार्य ने किया है। पुराना मंदिर महाभारत के समय का बताया जाता है। केदारनाथ धाम का नाम राजा केदार के नाम पर पड़ा जो सत्य युग में सात महा देशों पर शासन करते थे तथा बहुत ही धार्मिक प्रकृति के थे। कहा जाता है कि यहां पर पांडवों ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। इस मंदिर में सीधे सड़क मार्ग से नहीं जा सकते। गौरीकुंड से 14 किमी पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है।

केदारनाथ मंदिर का स्थापत्य -
इस मंदिर की स्थापत्य कला नागर शैली की स्थापत्य कला की एक शाखा कातयुरी शैली में बनी है।यह 85 फीट उंची, 187 फीट लंबी, 80 फीट चौड़ी है। इसकी दीवारें 12फीट मोटी है। केदारनाथ मंदिर 6 फीट उंचे चबूतरे पर बनी है।

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भारत के उत्तराखंड के केदारनाथ शहर में सिथत भगवान शिव का 1000 साल पुराना यह मंदिर गढ़वाल हिमालय में लगभग 12,000 फीट की उंचाई पर बना है। यह हरिद्वार से 150 मील और ऋषिकेश के उत्तर में 132 मील दूर सिथत है।

केदारनाथ मंदिर पहाड़ के संकरे किनारे पर बना है।कहा जाता है कि वर्तमान मंदिर 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थपित है। इसमें एक सभागृह और गर्भ गृह है। मंदिर के मुख्य द्वार पर धूसर चटटानों को काटकर बनाया गया नंदी बैल है। वहां पर नुकीले गोल आकार का पत्थर भगवान शिव के सदाशिव अवतार का प्रतिनिधितव करता है। गर्भ गृह के भीतर शिवलिंग सिथत है। मंदिर परिसर की दीवारें मूर्तियों से सजी हुई है। मुख्य कक्ष में पांडव, श्री कृष्ण और भगवान शिव के वाहन की मूर्ति है। केदारनाथ में एक अदभुत चीज देखने को मिलती है - तिकोन पत्थर के टुकड़े पर खुदा हुआ मानव का सर। 

मंदिर का इतिहास -

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केदारनाथ मंदिर का जोर्तिलिंग

केदारनाथ मंदिर का पुरातन इतिहास पांडवों से जुड़ा है। महाभारत के युद्ध में अपनों को मारने का दोष पांडवा पर लगा था। इस पाप से मुकित पाने के लिए पांडवों ने तीर्थ यात्रा की। कैलाश पहुंचने के लिए वह गुप्तकाशी से गौरीकुंड गए। वहां उन्हें भगवान शिव के दर्शन हुए और उनके सभी पाप धुल गए। तब भगवान प्रसन्न होकर उनके सामने ति्रकोण आकार के जोर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुए और तब से इसी की पूजा देश भर के भक्त करते आ रहे हैं।

कहा जाता है कि पुरातन मंदिर का निर्माण पांडवों ने द्वापर युग में किया था। इसके बगल में ही आदि शंकराचार्य द्वारा निर्मित वर्तमान मंदिर है। मंदिर के बड़े धूसर सीढ़ीयों पर पाली या ब्राम्ही लिपि में कुछ लिखा हुआ है जिसे आज तक पढ़ा नहीं जा सका। इतिहासकार डाण् शिव प्रसाद डबराल के अनुसार आदि शंकराचार्य से बहुत पहले ही केदार क्षेत्र में शैव ;शिव भक्तद्ध जाने लगे थे।

केदारनाथ मंदिर के पुरातन इतिहास का कोई प्रमाण नहीं मिलता है। मान्यता है कि यहां भगवान शिव प्रकट होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामना वहां दर्शन करने से पूर्ण होते हैं। केदारनाथ धाम की अपनी एक संस्कृति है। आज यह संस्कृति प्रकृति के तांडव से विनष्ट हो गई है। मंदिर तो एक साल बाद खुल जाएगा परंतु क्या पता इस संस्कृति को पुन: जीवित होने में कितना समय लगेगा।

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