Monday, November 20, 2017
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guru nanak dev

1469 - 1539
गुरू नानक देवजी सिख धर्म के संस्थापक थे। वह सिखों के दस गुरूओं में से पहले गुरू थे। उनका जन्म राई-भोई-की तलवंडी नामक गांव में हुआ था जो लाहौर के पास सिथत है और आज पाकिस्तान में है। आज यह ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। ननकाना साहिब सिखों का बहुत बड़ा तीर्थ है। गुरू नानक देव का जन्म क्षति्रय परिवार में हुआ। उनके पिता कल्याण चंद दास बेदी ,माता तृप्ता ,बड़ी बहन बेबे नानकी थीं। उनके पिता मुसिलम जमींदार राय बुलर भटटी के पटवारी थे और कालू मेहता के नाम से लोकप्रिय थे।


बेबे नानकी का गुरू नानक के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका है। गुरू नानक के दिव्य शकित को सबसे पहले उन्होने ही पहचाना था और वही अपने भाई की प्रथम शिष्या भी बनीं। अपने भाई से वह असीम स्नेह करती थीं और भाई से मात्र पांच साल की बड़ी होने पर भी वह उनके लिए मां की तरह थी। बेबे नानकी का विवाह उस जमाने के परंपरानुसार छोटी उम्र में जय राम के साथ हो गया । गुरू नानक 15 साल की उम्र में बड़ी बहन एवं बहनोई के साथ रहने चले गये। बेबे नानकी एवं जय राम ने गुरू नानक के लिए लड़की की तलाश प्रारंभ की और माता सुलखानी से लगभग 16 साल की उम्र में उनका विवाह हो गया। गुरू नानक और माता सुलखानी के दो पुत्र थे। उनका नाम श्री चंद और लक्ष्मी चंद था।
गुरू नानक जयंती कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है जिसे गुरू नानक प्रकाश पर्व भी कहते हैं। यह पर्व सिखों का बड़ा त्यौहार है जिसे वह श्रद्वा ,भकित एवं समर्पण से मनाते हैं।

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गुरू नानक जयंती का प्रारंभ अखंड पाठ से होता है। गुरूद्वारों में धर्मिक ग्रंथ गुरू ग्रंथ साहिब का पाठ बिना रूके 48 घंटे तक चलता है। जिसका समापन त्यौहार के दिन होता है।

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गुरू नानक जयंती से एक दिन पहले धर्मिक जुलूस या प्रभात फेरी निकलता है। जुलूस की अगुवाई पांच अस्त्रधारी व्यकित करते हैं जिन्हे पंज प्यारे कहते हैं। वह निशान साहिब अर्थात सिखों का झंडा लेकर जुलूस में चलते हैं। गुरू ग्रंथ साहिब को फूलों से सजे पालकी में रख कर जुलूस के साथ ले जाया जाता है। जुलूस गुरूद्वारे से निकलकर आस पास के इलाकों से गुजरता है। इसमें बैंड वाले भी होते हैं। कुछ लोग शबद कीर्तन गाते हुए चलते हैं। कुछ लोग पारंपरिक शस्त्रों के साथ युद्व कला का प्रदर्शन करते हैं इन्हे गटका दल कहा जाता है। जुलूस के रास्ते को झंडे , फूलों , धार्मिक चित्रों , बैनर , सिख धर्म के विभिन्न पहलूओं को उजागर करते चित्रों से सजाया जाता है। जब यह रंगारंग जुलूस निकलता है तो जाति धर्म की दीवार तोड़़कर सभी लोग जुलूस को निहारते हैं। 

गुरू नानक जयंती के दिन गुरूद्वारे में भोर से ही हलचल प्रारंभ हो जाती है। सुबह भजन गाए जाते हैं जिसे असा-दी-वर कहते हैं। सिखों के धार्मिक पुस्तकों से भजनें गायी जाती हैं और धार्मिक पुस्तकों की व्याख्या की जाती है जिसे कथा कहते हैं।गुरू के सम्मान में धार्मिक और ऐतिहासिक व्याख्यान होते हैं, कविताएं पढी जाती हैं। गुरूद्वारे के कक्ष में कीर्तन दरबार और अमृत संचार का आयोजन होता है।

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इसके पश्चात सामुदायिक भोजन अर्थात लंगर होता है।लंगर में जाति धर्म का भेद भाव नहीं होता । कोई भी लंगर में शामिल हो सकता है।यह भोजन शुद्व शाकाहारी बनता है। इसे बनाते वक्त सफाई का विशेष ख्याल रखा जाता है। लंगर का आयोजन गुरूद्वारे के सेवादार करते हैं। संक्रमित रोग से ग्रस्त व्यकित यह भोजन नहीं बना सकता। इस समुदाय के लोग लोगों में मिठाई बांटने और भोजन कराने को सेवा और भकित का अंग मानते हैं। गुरूद्वारे में उपसिथत सभी को कड़ा प्रसाद दिया जाता है।शाम को गुरूद्वारे और घर को दीया और मोमबतितयों से सजाते हैं। स्थानीय बैंड धार्मिक संगीत की धुन बजाते हैं , भांगड़ा और युद्व कला का प्रदर्शन होता है।लोक कलाकार इस त्यौहार में अलग ही रंग भर देते हैं।अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में गुरू नानक जयंती देखने लायक होती है।

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गुरू नानक महान संत ,सूफी , उन्नत दर्जे के कवि ,अदभुत भजन गायक थे। उनका एकमात्र संदेश था प्रेम ,शांति और सच्चाई का प्रचार करना। आज भी इस समुदाय के लोग गुरू की शिक्षा पर संपूर्ण विश्वास रखते हैं और गुरू नानक जयंती गर्व और सम्मान के साथ मनाते हैं।

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