Saturday, November 25, 2017
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हमारा घर उनके घर से सटा हुआ था। दोनों घरों के बीच दीवार थी जिसमें कोई खिड़की नहीं थी। काफी दिन सियासत में पापड़ बेल कर अब वे विधान परिषद के सदस्य बन गए थे।

उनका एक पैर लखनऊ और एक इलाहाबाद रहता। दोस्ताना तबीयत पाई थी। अगर एक दिन को भी घर आते, हमसे जरूर मिलते। कई बार ऐसा भी हुआ कि दोपहर में हमारे ही घर पर एक लंबी झपकी मार कर आराम कर लिया।

दरअसल उनके ऊपर लखनऊ की बेगम कुछ इस कदर मेहरबान थीं कि हाफिज भाई की अपनी बेगम हर दम तिनतिनाई रहतीं। बेगम लखनपुर ने पैसा खर्च कर उन्हें लखनपुर से विधायक बनवा दिया। हाफिज भाई लखनपुर खास से एक छोटा सा रिसाला 'आवाज' निकालते थे जिसकी बिना पर उन्हें पत्रकार मान लिया गया। बेगम लखनपुर जानती थीं कि दो चार नेता जेब में रखकर ही वे नाम कमा सकती हैं। उनके शौहर, नवाब लखनपुर, लंबे अरसे से, बाईं तरफ के फालिज की चपेट में थे। वे अपने कमरे में पड़े रहते या सुबह के वक्त पहिया कुर्सी में अपने बगीचे की सैर करते दिखाई देते। उनके शरीर का दायाँ हिस्सा ठीक था पर वे दिन भर में अपने दाएँ पाँव और हाथ पर जोर डाल कर उस हिस्से को भी थका डालते। मालिशवाला दिन में दो बार आकर उनकी मालिश कर जाता लेकिन उनके अंग अंग में हर वक्त दर्द रहता। बेगम लखनपुर शौकीन महिला थीं। उन्हें किस्से, कहानियाँ, लतीफे और पुराने गाने सुनने का शौक था। हाफिज भाई ने उनकी यह नब्ज पकड़ रखी थी। आलम यह था कि अगर बेगम लखनपुर को रात में नींद न आती तो वे फौरन हुक्म करतीं, 'हाफिज साहब को बुलाया जाय।' नवाब बिस्तर पर लेटे लेटे कान खड़े कर लेते। उन्हें नींद बहुत कम आती और जब आती तो नींद से ज्यादा खर्राटे आते। जैसे ही खर्राटे टूटते, उनकी नींद भी खुल जाती। उन्हें घर में मेहमानों का या बाहरी आदमियों का आना पसंद नहीं था पर हाफिज भाई के आने पर वे नहीं भड़कते। हाफिज थे भी बड़े व्यवहार कुशल। सबसे पहले वे नवाब साहब के पास बैठ कर उनकी खैरियत पूछते, फिर मुहब्बत से कहते, 'नवाब साहब क्या लीजिएगा, पानडली या सिगरेट?

हाफिज के पास चाँदी की डिब्बी में मगही पान के बीड़े, जोड़े में लगे होते और जेब में 120 नंबर का जर्दा। जोड़ा पान मुँह में रखते ही नवाब साहब की तबीयत मस्त हो आती। इसके बाद दीवानखाने में हाफिज, बेगम लखनपुर के लिए, किस्सों की पिटारी खोल कर बैठ जाते। बेगम लखनपुर हँसते हँसते लोट पोट हो जातीं। कई बार के सुने हुए किस्से भी वे उसी शिद्दत से सुनतीं। आखिरकार हाफिज की आँखें झपकने लगतीं। वे उठ जाते, 'चलते हैं बेगम साहिबा, शब्बा खैर'।

हमने भी हाफिज भाई से बेशुमार लतीफे सुन रखे थे। सुनाते वक्त वे खुद भी अपनी बात का खूब लुत्फ उठाते। उनकी बुलंद आवाज में मामूली बातें भी गैरमामूली लगतीं। शाम के वक्त कभी-कभी वे हमारे घर में व्हिस्की के दो एक पैग भी ले लेते। ऐसे दिन में वे अपने किस्सों में खुद को शहसवार बना लेते। वे भूल जाते कि एक बार पहले भी यह किस्सा दूसरी तरह से सुना चुके हैं। इंदिरा गांधी को लोकनाथ की जलेबी पसंद थी। यह किस्सा वे एक बार फिर शुरू कर देते जिसका अंत इस तरह होता, 'और आप यकीन करेंगे मैंने सुबह आठ बजे, अपने लोकनाथ भैरव जलेबीवाले को सात रेसकोर्स रोड पहुँचा दिया, कढ़ाई, पौनी, कनस्तर समेत।' मैडम भौचक्की रह गईं, उन्होंने कहा, 'हाफिज भाई आपका भी जवाब नहीं।'

ऐसे ही किसी लम्हे में उनके घर से बुलावा आ जाता। उनका मूड उखड़ जाता। वे झुँझला कर अपने होठों से हटा कर सिगरेट कुचल देते। वे कहते, 'पता नहीं क्यों बेगम के सामने जाकर मेरी सारी शराब पानी बन जाती है।'

हाफिज की बेगम उनका विलोम थीं। कहने को तहमीना हमारी पड़ोसन थीं, उनसे हमारा मिलना जुलना नहीं के बराबर था। उनका ज्यादा वक्त अपनी बेटियों की या अपने रक्तचाप की देखभाल में कटता। बगल की धोबी गली में उनकी बहन सईदा रहती थी। खाली वक्त वे वहाँ काटतीं। हम इस मुहल्ले में नए आए थे। अल्पसंख्यकों से भरी इस बस्ती में हमारा ज्यादा जोर इस बात पर था कि हम सबको बता दें कि हम छाप-तिलक वाले हिंदू नहीं हैं और हमारा सबसे पसंदीदा शायर गालिब है तो सबसे अजीज गायक मुहम्मद रफी और तलत महमूद। दिलीप और मीना कुमारी हमारे दिल पर राज करते रहे हैं और इन दिनों हम कुरान पाक का हिंदी तर्जुमा पढ़ रहे हैं।

हाफिज हमसे कहते, 'अमाँ तुम कट्टर नहीं हो यह साबित करने में अपनी जान क्यों हलकान करते हो। यह क्यों नहीं साबित करते कि तुम भी हम जैसे इनसान हो।' हम उनकी बातों के कायल हो जाते।

इधर जब से मुल्क में आतंकवाद बढ़ा, हर विधायक को एक-एक अंगरक्षक मिल गया था। उसका काम था, परछाई की तरह विधायक के पीछे-पीछे रहना। हाफिज को भी शैडो मिला। जब वे इलाहाबाद आते, शैडो उनके साथ आता।

सुबह के वक्त हाफिज अपनी भारी भरकम आवाज में पुकारते, 'शैडो भई अंदर जाकर देखो, चाय बन गई हो तो हमें भी ला दो और खुद भी पी लो।'

सभी विधायक अपने शैडो से खाना भी बनवाते। हाफिज कहते, 'अरे ये पंडत हमें दाल भात के सिवा क्या पका कर खिलाएगा? खाना तो हम अपनी बेगम के हाथ का ही खाएँगे।'

उनकी प्यारी बेगम तहमीना के माथे की त्योरियाँ इस बात से जरा भी सीधी न होतीं। वह बावर्चीखाने में पसीना पोंछती हुई बड़बड़ातीं, 'मुफ्त की नानबाई मिली हुई है इन्हें। खुद दुनिया जहान में घूमें, हमें बेटियों की आया बना कर डाल दिया है।' उनके घर में पैसों की खींचतान नहीं थी। अक्सर तहमीना रानी मंडी के सुनारों की दुकानों पर दिख जातीं। अगर कभी हमारी नजर पड़ जाती वे फौरन कहतीं, 'दो बेटियाँ ब्याहनी हैं, इनके लिए तो दो टोकरी जेवर भी कम पड़ेंगे।'

हाफिज दो एक दिन से ज्यादा घर में न टिकते। जाते हुए हमसे कहते, 'घर के बिस्तर पर नींद नहीं आती। रेल की ऐसी आदत पड़ गई है कि गाड़ी में सवार होते ही सो जाता हूँ।'

हाफिज की दोनों बेटियाँ, सना और सुबूही बेहद शोख और खूबसूरत थीं। सना इतनी गोरी थी कि उसके माथे की नीली नस हमेशा झलक मारती रहती। सुबूही भी आकर्षक थी लेकिन कुछ कम गोरी। सना चुप्पा थी तो सुबूही बातूनी। वह कहती, 'पापा ममी सना आपा की चाहे जितनी तारीफ करते रहें, दुनिया की दौड़ में अव्वल तो मैं ही आऊँगी।'

उसकी इस तेजी का थोड़ा अंदाज हमें भी था क्योंकि वह अपने दोस्तों से बातचीत, अपने घर के फोन से न कर, हमारे घर के फोन से करती।

उसने मुझसे कहा, 'आंटी अगर पूनम का फोन आए तो मुझे जरूर बुला दीजिएगा। बस छत पर से आवाज दे दीजिए, मैं फौरन आ जाऊँगी।'

कुछ दिनों की बातचीत सुनने के बाद मुझे यह अहसास हुआ कि जिसे वह पूनम का फोनकाल बताती थी, दरअसल वह पूनम के भाई का फोनकाल था। पूनम फोन मिला कर, अपनी आवाज मुझे सुना कर फोन अपने भाई क्षितिज को दे देती।

मेरा खयाल था हमें यह राज सुबूही के माँ-बाप को बता देना चाहिए। कुल दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची अपना भला-बुरा कैसे पहचान सकती है। लेकिन राजेश ने मुझे बरज दिया।

'दूसरों की जिंदगी में झाँकना गलत काम है। 16 साल की लड़की अपना भला-बुरा समझ सकती है। फिर हम पर भरोसा करती है जो टूट जाएगा।' राजेश का तर्क था। मन ही मन कसमसाकर रह गई मैं।

अपनी तरफ से बस इतना किया कि कई बार जब पूनम का फोन आया तो झूठ ही कह दिया, 'मैं अभी नहा रही हूँ या बाजार जा रही हूँ।'

घर से दूर और अलग रहते-रहते हाफिज आजाद परिंदे हो गए थे। वे बाहर खूब खुश रहते। उन्हें दारुलशफा में एक फ्लैट मिला हुआ था। लखनपुर में 'आवाज' दफ्तर के पीछे ही दो कमरों में उनकी रिहाइश का इंतजाम था। वे लगातार दौरा करते। बीच-बीच में इलाहाबाद आते लेकिन घर में मेहमान बने रहते।

उनसे मिलने वालों की तादाद काफी थी। सभी का सरकार में कोई न कोई काम फँसा रहता। हाफिज सबके साथ मुहब्बत से बोलते। काम हो न हो, फरियादी उनके पास खुश होकर लौटता। उनकी लोकप्रियता तहमीना के गले न उतरती। वह बेटियों को सुना कर कहती, 'तुम्हारे पापा सारी दुनिया से प्यार से बोलते हैं, बस बीवी के ऊपर तोप ताने रहते हैं।'

सना, सुबूही चुप मार जातीं। उन्हें अपने पिता से कोई शिकायत नहीं थी। पिता के सिर पर उनके सारे ऐश-ओ-आराम थे। दोनों लड़कियाँ अपने हेयरकट के लिए लखनऊ के 'शीलाज' पार्लर में जातीं। हाफिज तरक्की करते-करते विधायक से सांसद बन गए और दिल्ली पहुँच गए। उन्हें फीरोजशाह रोड पर एक शानदार बंगला मिल गया। हमारे पड़ोस का उनका छोटा सा घर मंजिल दर मंजिल ऊँचा होता गया। उनकी बीवी अधेड़ होती गई, उनकी बेटियाँ जवान होती गईं।

हाफिज भाई की कामयाबी का चर्चा जिस वक्त चलता लोग पहले उनकी तारीफों के पुल बांधते, फिर आवाज दबा कर कहते, 'उनकी पीठ पर लखनऊ की बेगम सलमा का हाथ रहा। उन्हीं की बदौलत उनका यह टूटा-फूटा खपरैला मकान आज तिमंजिली इमारत बन गया। लखनपुर खास की हवेली, सलमा बेगम ने पूरी तुड़वाकर नए सिरे से बनवाई। हाफिज भाई ने रातों-रात ट्रकों में भरवा कर सारा संगमरमर, फर्नीचर, यहाँ तक कि बाथरूम के हौज और टंकियाँ भी रानी मंडी पहुँचवा दीं। अंदर किसी को जाने की इजाजत नहीं है पर सुना है कि उनका मकान एकदम महल बन गया है।'

जितना यह सच था, उतना यह भी सच था कि इस महल में रानी और दो राजकुमारियाँ कैद में पड़ी बुलबुलें थीं।

तहमीना का अपनी बड़ी बहन सईदा के घर उठना बैठना था। सईदा के शौहर की तीन साल पहले तपेदिक से मौत हो चुकी थी। उसके दोनों बेटे मिल कर, धोबी गली में ही पतंगें बेचने का काम करते। इस काम में कमाई खास नहीं थी पर उनका दिल लगा रहता। सईदा को वहम था कि ज्यादा मेहनत वाले कामों में फँस कर कहीं नदीम और फहीम भी अपने बाप की तरह तपेदिक के मरीज न हो जाएँ। नदीम और फहीम अपने हाल पर खुश थे। मुहल्ले के लड़के उन्हें छोटे मियाँ बड़े मियाँ कह कर इज्जत बख्शते और सलाम करते। शाम के वक्त वे अपनी दुकान पर कैरम के जवाबी मैच करवाते। मुहल्ले की लड़कियों की जासूसी करना, लखन पानवाले के अड्डे पर खड़े रहना और नए लड़कों को पतंग के दाँव पेंच समझाना उनके अहम काम थे। उनकी पढ़ाई नवीं क्लास से आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि तभी प्रदेश भर में नकल विरोधी अध्यादेश जारी हो गया। नदीम और फहीम ने खत्री पाठशाला से दसवीं का परीक्षा फार्म तो जरूर भरा लेकिन ऐन इम्तिहान के दिन दोनों घर पर बैठ गए। माँ को समझा दिया कि, 'बड़ा खराब कानून पास हुआ है इस बार। हाल में बैठ कर जो दाएँ से बाएँ देखा तो हथकड़ी पड़ जाएगी। जमानत भी नहीं होगी, सीधे हवालात।' सईदा आपा घबरा गईं। उन्होंने दोनों बेटों की बलाएँ उतारीं और कहा, 'चलो हमें कौन सी नौकरी करवानी है, हमारे चिराग सलामत रहें।'

सईदा की हार्दिक अभिलाषा थी कि नदीम का ब्याह हाफिज की बड़ी बेटी सना से हो जाए। लेकिन एक तो सना नदीम से आठ माह बड़ी थी, दूसरे बीए के आखिरी साल में बैठने वाली थी। फिर तहमीना भी इस रिश्ते को नकार चुकी थी। उसका खयाल था सना का रिश्ता किसी शाही खानदान में होगा।

सना इस बार हमारे घर आई तो तिनतिना रही थी। उसने कहा, 'आंटी, नदीम भाई ने हमारे ऊपर फतवा जारी किया है कि हम खुले मुँह यूनिवर्सिटी नहीं जा सकती। उनके हिसाब से हमारा हिजाब पहनना जरूरी है। दूसरे जींस पहनने पर भी पाबंदी लगाई है। आप बताइए आंटी आज के जमाने में इन दकियानूसी हिदायतों का क्या मतलब है। मैंने अम्मी से कह दिया जींस इतने मोटे कपड़े की होती है कि आराम से निकल जाते हैं। सबसे बड़ी बात ये, पाबंदियाँ लगाने वाले नदीम भाई आखिर होते कौन हैं?'

'तुम्हारे रिश्तेदार हैं और तुम्हारी अम्मी इस रिश्ते को निभाती भी हैं।'

'तो फिर अम्मी पर लगाएँ न पाबंदी। पापा ने हमें कभी नहीं रोका। पापा कहते हैं चाहे जो करो बस पढ़ाई में अव्वल आओ।'

इन लड़कियों के पापा को कभी इतनी फुर्सत न मिली कि उनकी शादी की फिक्र करें। उनका बहुत सा वक्त संसद के सत्रों में बँधा रहता। बाकी वक्त उन्होंने बेगम लखनपुर के हवाले कर दिया।

सना और सुबूही और उनकी माँ तहमीना के अपने-अपने तहखाने बनते गए।

पहले मुहर्रम और चेहल्लुम पर ये माँ बेटियाँ खाली वक्त में मर्सिये और नौहों का रियाज किया करती थीं। इन्हीं के इमामबाड़े से जुलूस उठा करता। जुलूस अब भी उठता लेकिन अब वे स्टीरियो पर मर्सिये का कैसेट लगा कर, खुद अंदर वाले कमरे में इकट्ठी बैठ कर पाकिस्तानी धारावाहिक देखती रहतीं।

हाफिज के आने पर तहमीना फिर पाँच वक्त की नमाज पढ़ने लगतीं। हालाँकि जाँनमाज कहाँ पड़ा है यह ढूँढ़ने में काफी मशक्कत पड़ती।

अगर लड़कियों को यूनिवर्सिटी में देर हो जाती तो तहमीना घर आए शौहर को सफाई देतीं, 'आजकल दोनों बहनें लायब्रेरी में बैठ कर पढ़ाई करती हैं। आप ही सोचिए, ऐसी मोटी-मोटी किताबें कैसे तो उठा कर लाएँ?'

हाफिज भाई के आने की खबर अक्सर पहले ही अखबारों में छप जाती। तरह-तरह के फरियादी घर के चक्कर काटने लगते। फल, मेवा, मिठाई की डलियाँ पहुँचने लगतीं। लड़कियाँ अपने रंग-बिरंगे कपड़े और जींस जैकेट, सब उठा कर रख देतीं और एकदम दकियानूसी सलवार कमीज धारण कर लेतीं। तहमीना अपने बाल मेहँदी से रँग लेतीं। नसीबन और हाजरा तीनों ड्योढि़यों का रगड़-रगड़ कर पोंछा लगातीं। दो दिन की मेहनत में उनका मकान इंस्पेक्शन बंगलों जैसा सँवर जाता।

हम भी अपने कमरे के तख्त की चादर बदल लेते, बिखरे हुए एलपी समेट कर एक जगह चिन देते और स्टीरियो को झाड़ पोंछ कर चमका देते।

कभी कभी हाफिज भाई राजेश को समझाते, 'अमा तुम अदीब हो, पत्रकार हो यह सब तो ठीक है। पर तुम्हें थोड़ा प्रैक्टिकल भी होना चाहिए। अफसाने लिखने से पेट नहीं भरता, तुम्हें कोई रोजगार करना चाहिए। कल को घर में बाल बच्चे होंगे तो खर्चे बढ़ेंगे, जिम्मेदारियाँ बढ़ेंगी।'

राजेश के अंदर अपनी आलोचना सुनने की बरदाश्त बिल्कुल नहीं थी। वह पलट कर कहता, 'हाफिज भाई आप पैसे को बहुत बड़ी ताकत समझते हैं और कामयाबी को दौलत। मैं कलम की ताकत को इस सब से ऊपर मानता हूँ।'

'तुम्हारी उम्र में मेरे भी ऐसे खयालात थे पर हालात ने मुझे काफी सबक सिखाए। जब मैं सिर्फ खबरनवीसी करता था, मेरी बच्चियाँ दूध को तरस जाती थीं। मैंने तभी तय कर लिया कि कामयाबी हासिल कर के रहूँगा।' हाफिज हमें कामयाबी का ककहरा सिखाते। राजेश तुनक कर कहता, 'कामयाबी और तसल्ली के बीच मैंने तसल्ली चुनी है।'

'तसल्ली बड़ी तकलीफदेह होती है। आप पत्थर की तरह एक ही जगह में पड़े रह जाते हैं। बरखुरदार अपनी पिटारी से बाहर निकल कर देखो, दुनिया किस रफ्तार से बढ़ रही है।' ऐसे बहस वाले दिन हमें नागवार लगते। हाफिज अपने आप को बेहद कामयाब इनसान मानते। उनकी नसीहत पर तहमीना ने यह टोटका अपना रखा था कि जब भी वे घर आते, वह तेल का भरा, चौड़ा कटोरा उनके सामने पेश करती। वे तेल के कटोरे में झाँक कर अपना चेहरा निहारते और आँख बंद कर एक दुआ बुदबुदाते। उसके बाद कटोरे का तेल किसी फकीर को दे दिया जाता। अगर कभी हाफिज भाई को खाँसी भी हो जाती, उनकी बेटियाँ कहतीं, 'हमारे पापा को दूसरों की नजर झट से लग जाती है।'

सना और सुबूही लखनऊ जाकर शीलाज ब्यूटी पार्लर में अपने बाल सेट करवातीं। उनकी सलीके से तराशी गई भवें और रोमरहित रेशमी बाँहें जता देतीं कि वे अपने रखरखाव पर काफी धन और समय खर्च करती हैं। दो एक बार उनके शैक्षिक प्रमाणपत्र और अन्य कागजात सत्यापित करते समय मैंने देखा था कि पिता की मासिक आय के कॉलम में वे मात्र 1000 रु लिखतीं, विधायक की यही निर्धारित आय होती होगी। इतनी आय में हाफिज दो घरों और दो बेटियों का खर्च कैसे उठा रहे थे जबकि इतने पैसों में एक घर चलाना भी आसान नहीं था। ये और कुछ अन्य सवाल ऐसे थे जो हमेशा हवा में लटके रहते। ये पूछे नहीं जा सकते थे। इनमें लोगों के दिमागी मिर्च-मसाले मिल जाने पर तरह-तरह की अफवाहें पैदा होतीं। एक अफवाह थी कि लखनपुर खास की हवेली टूटने के वक्त वहाँ का शाही खजाना हाफिज के हाथ लग गया, उसी के जलवे नजर आते हैं। दूसरी अफवाह थी कि हाफिज की बेगम तहमीना की माँ ने अपने गाने-बजाने की तमाम कमाई अशर्फियों की शक्ल में अपनी दोनों बेटियों को बाँट दी, उसी की बरकत दिखाई दे रही है। रानी मंडी की खासियत यह थी कि वहाँ हर मकान और परिवार के साथ कोई न कोई पुराना किस्सा नत्थी था। यहाँ के बाशिंदे अपने बाप-दादा की शान बान के किस्सों के सहारे अपनी मौजूदा बदहाली काट लेते। बहुतों को यहाँ नवाब कह कर पुकारा जाता जबकि इस गली में कोई नवाब परचून की दुकान चलाता तो कोई चाय बिस्कुट की।

अच्छे भले हम यहाँ रह रहे थे कि एक दिन हमें खबर मिली कि हमारे मकान का मालिक बदल गया है। हमारे मौजूदा मकान-मालिक ने यह मकान मय किरायेदार अपने एक दत्तक-पुत्र ओमप्रकाश के नाम कर दिया। उन्होंने अपने बीवी-बच्चों को उपेक्षित कर यह वसीयत कर डाली क्योंकि उनकी बीमारी में बीवी-बच्चे उनके काम नहीं आए जबकि ओमप्रकाश उन्हें हर पल हाजिर मिला। वसीयत के चंद महीनों बाद ही मकान-मालिक की मौत हो गई।

अगले ही हफ्ते ओमप्रकाश ने हमें मकान खाली करने का नोटिस दे डाला। अच्छा नहीं लगा। हमने तय कर लिया कि हम यहाँ नहीं रहेंगे। कुछ ही दिनों की दौड़धूप से शहर की घिचपिच से हटकर एक बेहतर मकान हमें मिल गया। यह घर बड़ा और हवादार था। सामने पब्लिक पार्क था और पीछे गंगा का कछार। बाजार कुछ फासले पर था पर फेरीवाले और ठेलेवाले भी दिन भर गुजरते। कुछ एक आदतें हमारी ऐसी थीं जो हमें पुराने घर की याद दिला देतीं। नए बाजार में मिलने वाले मसाले हमारे मुँह नहीं लग रहे थे। हमें अपने पुराने बाजार का गरम मसाला और पिसा जीरा याद आ जाता, कभी वहाँ के पापड़ और बड़ी की हुड़क उठती। हम तय करते एक दिन चौक जाकर यह सब लाया जाय।

ऐसे ही एक दिन जब हम चौक में खरीदारी कर रहे थे हमारा मन हुआ हाफिज भाई के यहाँ चला जाए। अपना पुराना घर देखने की भी ललक थी। राजेश बोले, 'आजकल संसद का सत्र नहीं है, हो सकता है हाफिज भाई आए हुए हों।'

मेरी मुखमुद्रा ताड़ कर उन्होंने जोड़ा, 'नहीं हुए तो बस दुआ सलाम कर खिसक लेंगे।'

हम बड़े चाव में अपने मुहल्ले की तरफ मुड़े। नुक्कड़ के पानवाले लखन के यहाँ ही हमें नवाब दिख गए। वे पान की गिलौरियाँ अपनी डिब्बी में सजा रहे थे।

'आज कैसे रास्ता भूल पड़े' उन्होंने कहा।

'कई बार सोचा, आना ही नहीं होता। सब खैरियत तो है न?'

'मत पूछिए, आपका मकान तो बिजलीघर वाले कबाड़ी ने खरीद लिया। आजकल उसे पूरा गिरवा कर वहाँ मार्केट बनवा रहा है।'

हमारा जी धक से रह गया। पता नहीं क्यों हम सोच रहे थे वह वैसा का वैसा हमें मिलेगा, बस उसके छज्जे पर किसी और के कपड़े सूखते होंगे।

इसका मतलब यह हुआ कि हमारे खाली करते ही हमारे मकान मालिक के दत्तक पुत्र ने इसे हाथोंहाथ बेच डाला।

मन उखड़ गया। सोचा वापस चले जाएँ, लेकिन नवाब हमें इसरार के साथ गली में ले आए, 'हाफिज भाई भी आए हुए हैं आजकल, उनसे तो मिलते जाइए।'

जहाँ हमारा घर था वहाँ मशीनों से बहुत गहरा गड्ढा बनाया हुआ था। गली में चारों तरफ मलबा और गंदगी दिखा रही थी। हाफिज भाई की ड्योढ़ी पर एक सुरक्षाकर्मी कार्बाइन लिए तैनात था।

हम अंदर घुसने लगे ही थे कि उसने रोका। साथ का सामान अपने पास के रैक पर रखवाया तब आगे बढ़ने का इशारा किया।

अगली ड्योढ़ी में वही शैडो खड़ा मिला। उसने हमें पहचान कर नमस्ते की और कमरे के द्वार तक ले आया।

हाफिज, तीन-चार आगंतुकों से घिरे हुए थे। दिन के वक्त भी कमरे में तीन ट्यूबलाइट जल रही थीं। इतने रोशन कमरे में हाफिज भाई बुझे हुए लग रहे थे।

'आइए भाभी, आइए राजेश भाई' कह कर उन्होंने इस्तेकबाल तो किया लेकिन उनके चेहरे पर कोई चमक नहीं आई। आगंतुकों से वे गर्दन की हरकत से बतियाते रहे।

उनके चले जाने तक हमारा भी इरादा उठने का हो गया।

मैंने कहा, 'मैं जरा अंदर जाकर बहनजी और बच्चों से मिल लूँ।'

हाफिज ने जल्दबाजी में कहा, 'लड़कियाँ तो मुंबई चली गई हैं। पढ़ाई करने और बेगम सईदा आपा के यहाँ गई हैं।

'अरे सना-सुबूही दोनों चली गईं। कौन सा कोर्स पढ़ रही हैं वहाँ?'

'हमें कहाँ, याद रहता है। इतने मसले याद रखने पड़ते हैं। आप बताइए, कैसे आना हुआ? हाफिज भाई ने थोड़ी अधीरता दिखाई।

'कुछ नहीं बस यहाँ से गुजर रहे थे तो आपका ख्याल आ गया।'

'बताइए साहब, दो साल में आपको एक बार हमारा ध्यान नहीं आया और आज आप चले आ रहे हैं कि हमारा खयाल आ गया।'

अब तक राजेश भी थोड़े खिंच गए, 'मैं भी हैरान हूँ कि मुझे कैसे खयाल आया।'

हाफिज भाई ने अपनी कुर्सी से उठने की कोशिश की। वे उठ नहीं पाए। उन्होंने आवाज लगाई, 'शैडो।'

शैडो ने अंदर आकर उन्हें खड़ा किया। उन्होंने शैडो से पूछा, 'और कोई फरियादी है बाहर?'

'जी नहीं।'

शैडो की मौजूदगी में ही हाफिज ने हमसे कहा, 'कहिए आपकी क्या खिदमत करें। आपको अपना तबादला या तरक्की करवानी है तो कागज दे जाइए। बच्चे का दाखिला हो तो अगली बार मिलना मुनासिब होगा। और भी दो एक केसेज हैं।'

राजेश का मूड पूरी तरह उखड़ चला।

'हमें अफसोस है हम अपने पुराने दोस्त से मिलने चले आए। आप तो कोटा, परमिट, तबादला, तरक्की के दलदल में फँस गए हैं'

'मियाँ देखना पड़ता है, हर तरफ देखना पड़ता है।' हाफिज शैडो की तरफ मुखातिब हुए, 'हम आराम करने जा रहे हैं, कोई आए तो कहना हम घर पर नहीं हैं।'

खिन्न मन से हम बाहर आए। 'बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले' जैसे शेर की चोट समझ आ गई। पुराने घर के खुदे हुए गड्ढे की तरफ जरा भी न देख कर हम गंदगी से बचते-बचाते चलने लगे।

धर्मशाला के सामने वाले घर से नवाब साहब की आवाज आई, 'हमारे गरीबखाने को भी रोशन करें भाईजान'

हम ठिठक गए। नवाब बड़े इसरार से हमें अंदर ले गए। शरारा कुरती के ऊपर शोख सुर्ख दुपट्टा ओढ़े उनकी बेगम, बाराँ ने हमें आदाब किया और चाय बनाने चली गईं।

नवाब साब ने हमारी नस पर उँगली रख दी, 'एमपी साहब से मुलाकात हो गई?'

राजेश के मुँह से निकाला, 'एमपी होकर क्या इनसान इनसान नहीं रहता! वे तो पहचान में नहीं आए।'

'उनके ऊपर जलजला हो कुछ ऐसा आया। आपको पता है राजेश भाई, उनकी दोनों बेटियाँ घर छोड़ कर चली गईं।'

अब चौंकने की बारी हमारी थी, 'अरे, कब, कैसे, कहाँ?

सुबूही का तो किसी से अफेयर था, 'मेरा इतना बोलना था कि राजेश ने मुझे घुड़का, 'तुम्हें बीच में जरूर बोलना है। नवाब साब, बड़ी हैरानी की बात है, इतने पहरे के बीच से लड़कियाँ चली गईं। हाफिज भाई कह रहे थे वे पढ़ाई करने मुंबई गई हैं।'

'और क्या कहें। उनकी इज्जत का तकाजा है चुप रहें। उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट तक नहीं लिखवाई।'

तभी बाराँ चाय की ट्रे लेकर आ गईं। साथ में वेबे, मिठाई और नमकीन था।

बाराँ ने कहा, 'सना तो संजीदा लगती थी, सुबूही के रंग-ढंग अजीब थे। मैंने तो एक बार तहमीना आपा से कहा भी था पर वे उलटे मुझ पर ही बिगड़ने लगीं।'

'हमारे यहाँ भी उसके फोन आया करते थे', मैंने कहा। 'फोन आने से कोई भाग नहीं जाता', राजेश ने टोका। 'उसकी अलग दास्तान होगी।'

नवाब साब ने कहा, 'देखिए भाईजान जब बाप घर से दूर रहे और माँ बावर्चीखाने में, तो बच्चों के भटकने में देर नहीं लगती। कई बार हमारे घर भी ये लड़कियाँ आतीं। बेगम से कहतीं, 'आप कितनी खुशकिस्मत हैं बिना पर्दे आती-जाती हैं। हमारे ऊपर तो बंदिशें ही बंदिशें हैं।'

'लेकिन बंदिशें उन्होंने मानी कहाँ। सना का तो पता नहीं पर सुबूही - 'जैसे ही मैंने इतना कहा राजेश फिर बमक गए, 'तुम बीच में फतवे क्यों दे रही हो, क्या जानती हो तुम उनके बारे में?'

बाराँ ने कहा, 'आपा तो अपना खयाल बता रही हैं। हम सब हैरान हुए। मुश्किल यह है कि हाफिज भाई इस हादसे की पूरी जिम्मेवारी आंटी पर डाल रहे हैं।'

'एक तरह से बनती तो है। आखिर बेटियाँ उन्हीं के पास रहती थीं।'

'आंटी की तबीयत बड़ी खराब रहती थी। वे बेचारी रात को नींद की गोली लेकर सो जातीं। उन्हें क्या पता बेटियाँ क्या कर रही हैं?'

'क्या हो गया उन्हें?'

'एंग्जायटी न्यूरोसिस,' बाराँ ने बताया, 'उन्हें हर वक्त दो फिक्रें खाए जातीं। पहली यह कि उनके शौहर दूसरी शादी न कर लें, दूसरी यह कि इन लड़कियों की शादी कैसे होगी।'

'इतनी खूबसूरत और जहीन लड़कियों की शादी में क्या दिक्कत थी?'

'आप नहीं जानते, हमारे सैयदों में पढ़े लिखे, नई रोशनी वाले लड़के ढूँढ़ना आसान नहीं, ऊपर से हाफिज भाई की मसरूफियत। भाभी साहब को हर वक्त तनाव रहता।'

'मुंबई कोई इतनी दूर भी नहीं, वहाँ जाकर पता किया जा सकता है'।

सब किया राजेश भाई पर कोई सुराग नहीं मिला फिर मुंबई तो लड़कियों के मामले में मगरमच्छ है।'

बाराँ ने धीरे से कहा, 'यह भी पक्का नहीं पता कि सन्ना और सुबूही मुंबई गईं या कहीं और?'

बड़े भारी मन से हम वहाँ से वापस आए। मेरे मन में रह-रहकर यही सवाल टक्कर मारता रहा, हाफिज भाई अपने को क्या समझते होंगे, कामयाब या गैर-कामयाब इनसान!

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