Saturday, November 25, 2017


टीवी की शौकीन हमारी नानी जी।
खाती हैं नमकीन हमारी नानी जी।


जीवन बीता कभी मदरसे नहीं गईं,
भैंस के आगे बीन हमारी नानी जी।

बाल साहित्य


"नानी मैं पहाड़ ला सकती हूँ।" - कहकर डोलू हँसी।

नानी चौंकी। बोली - "हे भगवान! लड़की है कि तूफान। क्या तो इसके दिमाग में है ।" फिर

बोलीं - "लेकिन कैसे? क्या तुम्हारी कोई परी दोस्त है, जो मदद करेगी?"

"हाँ नानी! है न मेरी परी दोस्त।"

बाल साहित्य


माघ की रात। तालाब का किनारा। सूखता हुआ पानी। सड़ती हुई काई। कोहरे में सब कुछ ढँका हुआ। तालाब के किनारे बबूल, नीम, आम और जामुन के कई छोटे-बड़े पेड़ों का बाग।

बाल साहित्य


दिल्‍ली में संसद सदस्‍यों के बड़े बँगलों के पीछे छोटी-छोटी गलियाँ हैं। इनमें छोटी-छोटी झुग्गियों में धोबी, घरेलू नौकर, शाक-सब्‍जी बेचने वाले, कबाड़ी और तरह-तरह के छोटे-मोटे काम करने वाले लोग रहते हैं। लोग हुए तो पता नहीं कुत्‍ते कहाँ से आकर बस जाते हैं।

बाल साहित्य


पात्र

महात्मा गाँधी : वयोवृद्ध अवस्था

मोहनदास : महात्मा गाँधी के बचपन की भूमिका, उम्र 8-10 साल

बालक 1 : मोहनदास का बालसखा, उम्र 8-10 साल

बालक 2 : मोहनदास का बालसखा, उम्र 8-10 साल

पुतलीबाई : मोहनदास की माँ, युवावस्था

सुहासिनी : बालिका, उम्र 8-10 साल

भजन गायक व प्रार्थना सभा में श्रद्धालुओं के तौर बैठाने के लिए अन्य बालक-बालिकाएँ अलग-अलग आयु-वर्ग के; संख्या : आवश्यकतानुसार।

बाल साहित्य

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