Saturday, November 25, 2017

tarun

गाँव में अँधेरा था। बस्तर के नक्शे पर आज भी उस गाँव का नाम नहीं दीखता। वहाँ अँधेरा है।

गाँव जंगल में था। जंगल गाँव में था। दोनों के अँधेरे एक-दूसरे में थे। दोनों अपने अँधेरों को बाँटते थे। वहाँ अँधेरों की कोई लड़ाई नहीं थी। वह एक बिल्कुल नई दुनिया थी। वहाँ अँधेरे बाँटने का शऊर था।

कहानी

mempi

कितनी लंबी और तीखी मार होती है फिर वह चाहे मौसम की हो या सिपाही की। चौंक कर उड़ी फड़फड़ाती हुई चील की तरह रज्‍जन की तकलीफ भरी हुई एक सदा-सी सुन पड़ी… 'ओ माँ...'

कहानी

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एक जमाईजी थे। वह संकोची स्वभाव के थे। एक बार वह अपनी ससुराल गए। वहाँ पर वह बात-बात पर झेंपने लगे। झेंपू तो पहले ही से थे, ससुराल होने के कारण 'करेला और नीम चढ़ा' वाली हालत हो गई।

भोजन करने बैठे तो इच्छा होते हुए भी हर चीज के लिए इनकार करने लगे। उनकी साली राब परोसने आई तो उन्होंने अपनी आदत के अनुसार इनकार कर दिया।

संयोग से राब की एक बूँद उनकी पत्तल पर गिर गई। उन्होंने उसे चाटा तो बड़ी अच्छी लगी। उनकी इच्छा हुई कि कोई उन्हें राब परोस दे, पर झेंपू स्वभाव के कारण माँगें तो कैसे? उनकी इच्छा मन में ही रह गई।

मगर राब की उस बूँद ने उन्हें तड़पा दिया। उसका स्वाद हर घड़ी जीभ पर अनुभव होने लगा। वह राब पाने की जुगत सोचने लगे। रात को जब सब जने सो गए तो उन्होंने अपनी पत्नी पूछा कि राब की मटकी कहाँ रखी है। पत्नी ने पास के कमरे में छींके पर टँगी मटकी की ओर इशारा कर दिया। जमाईजी की बाँछें खिल गईं। वह दबे पाँव छींके के पास पहुँचे।

मगर ठिंगने कद के होने के कारण छींके पर उनका हाथ नहीं पहुँचा। अचानक उनकी निगाह कोने में रखी लकड़ी पर पड़ गई। उन्होंने लकड़ी से मटकी के पेंदे में छेद कर दिया। उस छेद में से राब चूने लगी। उन्होंने अपना मुँह फाड़ दिया।

इस तरह उन्होंने भरपेट राब खाई, लेकिन मटकी में से राब का टपकना फिर भी जारी रहा। वह बड़े घबराए। राब के नशे में उन्होंने मटकी में छेद तो कर दिया था, मगर अब क्या हो? छेद बंद करने का उन्हें कोई रास्ता ही नहीं सूझता था। अगर राब को फर्श पर गिरने दिया जाए तो सवेरे घर में नाहक होहल्ला मचेगा। लाचार जमाईजी मटकी के नीचे खड़े रहे और राब उनके शरीर पर टपकती रही। सारी मटकी खाली हो गई तब कहीं वह हटे।

अब जमाईजी के सामने समस्या आई कि देह और कपड़ों को कैसे साफ करें। इतनी रात को स्नान करने से भंडाफोड़ होने का डर था। इसलिए उन्होंने पास के कमरे में रखी कपास से ही बदन को पोंछना शुरू किया, लेकिन राब चिपकनी होने के कारण कपास उनके बदन से लिपट गई।

ज्यों-ज्यों वह राब छुड़ाने की कोशिश करते, कपास उनके शरीर से और चिपकती। होते-होते उनका सारा शरीर कपास से ढक गया। वह बड़े अजीब से प्राणी बन गए। उन्हें इस हालत में देखकर शायद ही कोई पहचानता। अब तो वह और भी घबराए। करें तो क्या करें? राब ने बड़ी उलझन में डाल दिया। घर के लोगों के जग जाने का डर अलग सता रहा था। अगर उन्हें ऐसा भूत बना किसी ने देख लिया तो क्या कहेगा!

बेचारे को जब कुछ नहीं सूझा तो वह कपास के ढेर से अलग हो गए और दबे पाँव बचते हुए ढोरों के कोठे की ओर बढ़े। सदर दरवाजे से तो बाहर निकलना मुमकिन नहीं था, इसलिए वह इस रास्ते पर आए। मगर दुर्भाग्य ने यहाँ भी उनका पीछा न छोड़ा। ढोरों के कोठे में पैर रखा ही था कि किसी के बोलने की आवाज उनके कानों में पड़ी।

उनकी जान सूख गई। डर लगा कि शायद घर के लोग जाग गए। वह साँस रोककर मन-ही-मन भगवान को याद करने लगे। मगर भगवान भी शायद आज उनसे रूठ गया था। बातों की फुसफुसाहट और पैरों की आहट पास ही आती जा रही थी। और कोई चारा न देख वह दुबककर भेड़-बकरियों के झुंड में छुपकर बैठ गए। सारा शरीर सफेद होने के कारण वह उन्हीं में से एक लगने लगे।

ढोरों के कोठे में जिनकी बातों की और पैरों की आवाज सुनाई दी थी, वे चोर थे। उन्होंने देवी की मानता मानी थी कि अगर आज चोरी में गहरा हाथ लगा तो वे एक भेड़ की बलि देंगे। संयोग से देवी ने उनकी मनोकामना पूरी कर दी। खूब हाथ लगा। इसलिए वे एक भेड़ की तलाश करने लगे।

अकस्मात उनकी निगाह भेड़ों के बीच दुबके जमाईजी पर पड़ी और वह उन्हें अपनी पसंद की भेड़ समझ बैठे। सारे कोठे में वही उनकी आँखों में चढ़ गए। उन्होंने फौरन उस मोटी-ताजी भेड़ को बोरे में भर लिया और कंधों पर लादकर ले चले।

जमाईजी की जान सूखी जा रही थी। कुछ कहते तो प्राण जाने का डर था। इसलिए बेचारे पानी में बहते तिनके की तरह लाचार रहे। मन-ही-मन राब को कोस रहे थे - इस सत्यानासी ने मुझे कितनी कठिनाई में डाल दिया।

चोर चलते-चलते देवी के मंदिर में पहुँचे। यहाँ वे बोझ को कंधे से उतारने लगे तो जमाईजी से नहीं रहा गया। वह बोल पड़े, 'भैया, जरा धीरे-से बोरी उतारना।'

चोर बोरी में से इस आवाज को सुनकर बड़े चकराए। उन्होंने सोचा कि यह क्या बला सिर पड़ी। घबराहट में बिना कुछ सोचे-समझे वे सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए। जाते समय वे अपना चोरी का धन भी ले जाना भूल गए।

जमाईजी देवी को याद करते हुए बोरी में से निकले। देवी ने उनकी जान बचाई, इसलिए उन्होंने उनका आभार माना। फिर उन्होंने पास ही बहती नदी में स्नान किया। राब और कपास को बदन से छुड़ाकर चोरों का सारा माल-मता लेकर सवेरा होने के पहले ही ससुराल पहुँच गए और सारा माल उन्होंने अपनी पत्नी के हाथ में रख दिया। पत्नी इतना सारा धन देखकर अचरज में रह गई।

जमाईजी ने हँसते हुए कहा, 'यह सब तेरी राब की करामत है।'

Courtesy:Hindisamay.com

 

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alice

एलिस मुनरो बीस साल की उम्र से कहानियाँ लिख रही थीं, लेकिन जब उनकी कहानियों की पहली किताब छपी, तब तक उनकी उम्र सैंतीस साल हो चुकी थी। 'डांस ऑफ द हैप्पी शेड्स' शीर्षक की इस किताब को कनाडा का सबसे बड़ा साहित्यिक पुरस्कार मिला। जब वह पुरस्कार लेने गईं, तो अखबारों में साथी लेखकों ने ताना कसा, 'उनका व्यवहार किसी शर्मीली गृहिणी की तरह था।'

एलिस मुनरो को इस साल का नोबेल पुरस्कार मिलना न केवल एक बड़ी साहित्यिक प्रतिभा को उसका ड्यू मिलना है, बल्कि यह उस गृहिणी, जिसके लिए तमाम आर्थिक तंगियों के बावजूद बच्चों की परवरिश, पति की जरूरतों और घर के तमाम कामों से बड़ी कोई प्राथमिकता नहीं होती, के घरेलू संघर्ष के बीच अपनी रचनात्मकता से कोई समझौता न करने की जिद का भी सम्मान है। इस समय 82 साल की मुनरो ने अपना ज्यादातर लेखन डायनिंग रूम में किया, जहाँ रसोई और अन्य कामों से समय चुरा वह दो-दो, चार-चार पंक्तियाँ लिख लेती थीं। उन्होंने दो महीने के बच्चे को पालने में झुलाते हुए कहानियाँ लिखीं। टाइप करते समय जब दो साल की बच्ची नींद न आने की शिकायत करते हुए उनकी गोद में आकर लेट जाती थी, तब वह दाहिने हाथ से उसे थपकी देतीं और बाएँ हाथ से टाइप करती रहतीं। (कहानी थी 'थैंक्स फॉर द राइड') ज्यादा समय नहीं मिलता था, इसलिए वह छोटी कहानियाँ ही लिखती रहीं, कभी लंबी कहानी या उपन्यास नहीं लिख पाईं। यह कसक उनके भीतर आज भी है।

और एक दिन वह इतनी बड़ी लेखक बन गईं कि अपने लिखे हुए से अपना घर चला सकें, तो तमाम बड़े लेखकों के कदमों पर चलते हुए उन्होंने अपने लिए एक बड़ा-सा दफ्तर किराए पर ले लिया, जिसमें उन्होंने तमाम किताबें सजाईं और लिखने के लिए बैठ गईं, पर वह वहाँ कुछ नहीं लिख पाईं। बड़ी मशक्कत के बाद उन्होंने एक कहानी लिखी, जो इसी थीम पर थी कि एक लेखिका अपने लिए दफ्तर बनवाती है, पर उसमें वह कुछ नहीं लिख पाती। (कहानी थी, 'द ऑफिस')

उन्हें ऐसे जीवन की आदत ही नहीं थी, सो वह वापस अपने कस्बे में लौट आईं। गाँव-देहात की अपनी दुनिया में। जिस समय अंग्रेजी का पूरा साहित्य महानगरों के आसपास केंद्रित है, मुनरो उन गिने-चुने लेखकों में से हैं, जिनकी कहानियों की किरदार कस्बाई लड़कियाँ होती हैं, जो अपनी छोटी-छोटी दुनिया में अपने स्त्री होने को कभी अभिशाप की तरह झेलती हैं, तो कभी अपनी मर्जी से अपनी पसंद का परचम बुलंद करती हैं। उनकी कहानियाँ घर, परिवार, स्त्रीत्व, मातृत्व के उन गलियारों में रहती हैं, जिन्हें बदलते दौर में पुराना विषय मान लिया गया है, लेकिन यही उनके लेखक का जीनियस है कि वह इनका ऐसा आधुनिक विश्लेषण करती हैं कि पाठक के रूप में हम चौंक जाते हैं। यह एक स्त्री की दुनिया के उन तिलिस्मी दरवाजों को खोल देती हैं, जिन्हें हम दरवाजा नहीं, बल्कि दीवार मानने की भूल कर रहे होते हैं। वह आख्यान रचने के ऐसे तरीके खोज लाती हैं, जो दिखने में बेहद सादे और सरल होते हैं, लेकिन उनके जरिए वह अपने पाठक की नसों में घुलती जाती हैं। बहिर्मुखी समाज में एक स्त्री के अंतर्लोक का चित्रण करने वाली मुनरो ऐसी लेखिका हैं, जिसे हर पुरुष को पढ़ना चाहिए।

यह तथ्य है कि दुनिया में कहानियों या जिन्हें अंग्रेजी में शॉर्ट स्टोरी कहा जाता है, को ज्यादा वजन नहीं मिलता। हर कहानीकार से उपन्यासकार हो जाने की उम्मीद की जाती है। चेखोव के बाद कहानी-कला का लगभग अवसान मान लिया गया। उसके बाद भी कहानी में काफी काम होता रहा। मुनरो नोबेल के इतिहास की पहली लेखक हैं, जिन्हें शुद्ध तौर पर कहानी या शॉर्ट स्टोरी के लिए यह पुरस्कार दिया गया है। इससे पहले इवान बूनिन को 1933 में मिला था, पर बूनिन ने कई उपन्यास भी लिखे थे। मारकेस को पुरस्कार देते समय उनकी कहानियों को भी रेखांकित किया गया था, लेकिन हम सभी जानते हैं कि मारकेस की बसाहट उनके उपन्यासों में ही है।

यह मुनरो की कहानियों की शक्ति ही है कि उपन्यासों के इस दीर्घ-कालीन युग में वह कहानी विधा में यह पुरस्कार पाती हैं। उन्हें पूरे सम्मान के साथ 'आज का चेखोव' कहा जाता है। इस उपाधि की वैधता की गवाही उनकी कहानियों से बेहतर और कोई चीज नहीं दे सकती। उन्हें मिला यह पुरस्कार विश्व-साहित्य के स्तर पर कहानी या शॉर्ट स्टोरी को नया जीवन देने की राह प्रशस्त कर सकता है।

कुछ तथ्‍य -

* कॉलेज की पढ़ाई के लिए स्कॉलरशिप ली, बाकी खर्च चलाने के लिए वेटर की नौकरी की, कई बार अपना खून बेचा, तंबाकू कारखानों में काम किया या लाइब्रेरियों में पार्ट-टाइम नौकरी की, लेकिन लिखने को लेकर जुनून कभी कम नहीं हुआ। 
* शुरुआती दौर में जब उनकी किताबें छपीं, तो साथी लेखक उन्हें पसंद नहीं करते थे। वह बेहद सुंदर थीं और उतनी ही प्रतिभावान-स्वाभिमानी, शायद इसीलिए उनके प्रति एक ईर्ष्‍या का भाव रहा। मुनरो को इस नापसंदगी के बारे में चालीस साल बाद पता चला। 
* एक बार एक महिला ने चार सौ डॉलर का भुगतान किया ताकि मुनरो अपनी कहानी के एक चरित्र का नाम उसके नाम पर रख दें। 'फ्रेंड ऑफ माय यूथ' में नर्स के चर्चित किरदार को मुनरो ने उस महिला का नाम दिया - ऑड्रे एटकिन्सन। 
* मुनरो ने अपने पहले पति जिम मुनरो के साथ कनाडा के विक्टोरिया में किताबों की एक दुकान खोली थी - मुनरोज बुक्स। आरंभिक वर्षों में उसमें इतना घाटा हुआ कि दिवालिया होने की नौबत आई। आज पचास साल बाद वह एक बड़ा गौरवशाली प्रतिष्ठान बन गया है। 
* 22 साल के विवाहित जीवन के बाद मुनरो ने अपने पति को तलाक दे दिया। उन्होंने दूसरी शादी उस पुरुष से की, जिसे वह बरसों पहले कॉलेज में मन ही मन प्रेम करती थीं। उस पुरुष को उस प्रेम के बारे में पचीस साल बाद पता चला और उसके चार घंटे के भीतर ही दोनों ने साथ रहने का फैसला कर लिया। 
* मुनरो की कहानियाँ सबसे ज्यादा 'न्यू यॉर्कर' में छपी हैं, पर पहली बार वहाँ छपने के लिए उन्हें बीस साल लंबा रिजेक्शन झेलना पड़ा। उनकी किताबें छपकर चर्चित हो चुकी थीं, फिर भी 'न्यू यॉर्कर' से उनकी कहानियाँ वापस आ जातीं, जिनमें जगह-जगह पेंसिल से टिप्पणियाँ और सुझाव लिखे होते। 
* इस साल की शुरुआत में मुनरो ने लेखन से संन्यास ले लेने की घोषणा की थी, लेकिन नोबेल मिलने के बाद उन्होंने कहा कि इससे उन्हें फिर से लिखने की प्रेरणा मिल सकती है।

Courtesy:Hindisamay.com

अन्य

manohar sahiyta

उस देश का यारो क्‍या कहना? और क्‍यों कहना? कहने से बात बेकार बढ़ती है। इसीलिए उस देश का बड़ा वजीर तो कुछ कहता ही नहीं था। कहना पड़ जाता था तो पिष्‍टोक्तियों में ही बोलता था। पिष्‍टोक्तियों से कोई नहीं पिटता।

व्यंग्य

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