Sunday, February 25, 2018

balkrishna

पुराना जाता है नया उसकी जगह क्‍यों आता है इसका ठीक उत्तर चाहे जो हो पर यह कह सकते हैं जैसे पृथ्‍वी की आकर्षण शक्ति के आगे कोई ऊपर को फेंकी हुई वस्‍तु ऊपर को निरावलम्‍बन न ठहर के नीचे गिर पड़ती है वैसे ही प्राचीन का जाना और नवीन का आना भी एक नियम हो गया है। प्राचीन के जाने का शोक होता है पर साथ ही उसके स्‍थान में नवीन के आने का जो हर्ष होता है वह उस प्राचीन के मिट जाने के विषाद को हटा देता है। इसी सिद्धांत के अनुकूल मनु महाराज का यह वाक्‍य है-

निबंध

balkrishna

स्त्रियाँ किसलिये हैं-हमारे शास्‍त्रों के अनुसार मर्द को सुख पहुँचाना इनका मुख्‍य काम है-'न स्‍त्रीस्‍वातन्‍त्र्यमर्हति' मनु के इस वाक्‍य का भी यही प्रयोजन सिद्ध होता है। मर्द हर हालत में और तीनों पन में स्त्रियों का मुहताज रहता है। बचपन से बुढ़ापे तक बिना इनके अपना काम न चलता देख मनु महाराज ने यह लिख दिया कि मर्द इनको अपने ताबे में रख इनसे काम निकाला करे। स्‍त्री और पुरुष दो जाति के बीच जैसा परस्‍पर का बर्ताव है उससे हमारी ऊपर की बात कि स्त्रियाँ पुरुषों के सुख के लिये हैं अच्‍छी तरह स्‍पष्‍ट है। अलावे मुहब्‍बत के माता अपने पुत्र को पालना, रोग-दोख, घाम-छांव से बचाये रखना अपना मुख्‍य काम समझती है। बहन अपने भाई का, देवरानी अपने देवर का सब काम कर देना अपना धर्म मानती है। स्‍त्री अपने पति को आराम और हर्ष पहुँचाना अपने लिये सबसे श्रेष्‍ठ काम वरन् अपने जन्‍म की सफलता मानती ही है इसे कौन न स्‍वीकार करेगा।

निबंध

balkrishna

नाम के कायम रखने को आदमी न जानिये क्‍या-क्‍या काम करता है। लोग कुआँ खुदाते हैं। बावली बनवाते हैं। बाग लगाते हैं। मोहफिल सजाते हैं। क्षेत्र और सदाबर्त चलाते हैं। नाम ही के लिए लोग लाखों लुटाते हैं। स्‍कूल पाठशाला और अस्‍पताल कायम करते हैं। इस तरह पर काम और नाम दोनों को बराबर साथ निभाता चला जाता है। सच कहो तो इस असार संसार में जन्‍म पाय ऐसा ही काम कर चले जिसमें नाम बना रहे जिन का नाम बना रहता है वे मानो सदा जीते ही रहते हैं। जिस काम से नाम न हुआ वह काम ही व्‍यर्थ है। काम भी दो तरह के होते हैं नेक और बद। नेक काम से आदमी का नेक नाम होता है प्राय: स्‍मरणीय होता पुण्‍य श्‍लोक कहलाता है। बद काम से बदनाम होता है उसका नाम लेते लोग घिनाते हैं- गालियाँ देते हैं। नाक और भौं सिकोड़ने लगते हैं-

निबंध

rakishor

                प्रसादजी की एक प्रसिद्ध कविता पंक्ति है- आह वेदना मिली बिदाई। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से विदा होते समय यह वाक्य मैं हरगिज नहीं दुहरा सकता। यहां लगभग तीन साल बीते और अच्छे-से बीते। पहला साल आवासी लेखक के रूप में। मैं विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय का कृतज्ञ हूं कि उन्होंने मुझे यह अवसर दिया। उन्होंने मुझे लेखक माना, यह मेरे लिए ज्यादा खुशी की बात है। वरना एक बार पत्रकार होने की मुहर लग गई, उसके बाद कौन लेखक और कैसा लेखक! मैं अपने शुभचिंतकों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि इस पूरी अवधि में मैं किसी के हरम में नहीं रहा। मुझे न हरम बनाने की कला आती है, न हरम में रहने का अभ्यास है। यहां रहते हुए मैंने सुनंदा की डायरीलिखी, जिसके बारे में मैं सोचता था कि यह हिट होगी, पर फ्लॉप साबित हुई। हिंदी अब बहुत सयानी हो चुकी है।

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imtiyaz ahmad ghazi

इलाहाबाद। साहितियक संस्था 'गुफतगू' के तत्वावधान में करैली सिथत अदब में मासिक काव्य गोष्ठी एवं नशिस्त का आयोजन किया गया। बुधवार की देर रात तक चले इस शेरो-शायरी के दौर में लोगों को खूब आनंद आया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार अजामिल ने किया, मुख्य अतिथि एहतराम इस्लाम और विशिष्ठ अतिथि पं. बुदिधसेन शर्मा थे। संचालन गुफतगू के अध्यक्ष इमितयाज़ अहमद ग़ाज़ी ने किया। सबसे पहले युवा अनुराग अनुभव ने ग़ज़ल पेश किया-

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