Sunday, November 19, 2017
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कल्पवास माघ माह में किए जाने वाला एक ऐसा व्रत है जिसका उददेश्य तन और मन में उपसिथत विकारों को निकालकर मोक्ष की राह की ओर अग्रसर होना है। एक महीने का यह व्रत पूरे वर्ष शरीर तथा मन को उर्जा सम्पन्न करता है।

प्रयाग के संगम तट पर एक माह रहकर लोग कल्पवास करते हैं। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। कभी-कभी आज की युवा पीढ़ी यह प्रश्न उठाती है कि आखिर कल्पवास' क्या है? वस्तुत: यह एक ऐसा व्रत है जो प्रयाग आदि तीर्थों के तट पर किया जाता है। यह बहुत ही कठिन व्रत है, इस व्रत में सूर्योदय से पूर्व स्नान, मात्र एक बार भोजन, पुन: मध्यान्ह तथा सायंकाल तीन बार स्नान का विधान है परन्तु अधिकांश लोग केवल सुबह, शाम स्नान करते हैं। कल्पवास के व्रत को एक माह में पूर्ण करते हैं। कल्पवास का अपना एक अलग विधान है। जो कल्पवासी लगातार बारह वर्ष तक अनवरत कल्पवास करते हैं, वह मोक्ष के भागी होते हैं। एक माह में कल्पवास की पूर्ति कर विशेष रूप से उसका उध्यापन किया जाता है। कर्मकाण्ड अथवा पूजा में हर कार्य संकल्प के साथ शुरू होता है और संकल्प में श्री श्रवते वारह कल्पे का सम्बोधन किया जाता है। इस कल्प का तात्पर्य यह है कि सृषिट के सृजन से लेकर अब तक 11 कल्प व्यतीत हो चुके हैं और बारहवाँ कल्प चल रहा है। कल्प' का एक अर्थ तो सृषिट के साथ जुड़ा है और दूसरे कल्प' का तात्पर्य कायाकल्प से है। कायाकल्प अर्थात शरीर का शोधन। इस कल्प को करने का आयुर्वेद शास्त्र में अलग-अलग विधान है। जैसे दुग्ध कल्प जिसमें एक निशिचत समय तक दूध अथवा मट्टे का सेवन कर शरीर का कायाकल्प किया जाता है और गंगा तट पर रहकर गंगाजल पीकर एक व भोजन, जन, कीर्तन, सूर्य अघ्र्य, स्नानादि धार्मिक कृत्यों के समावेश से शरीर का शोधन अर्थात शरीर का आध्यातिमक चेतना से जोड़ने की प्रक्रिया ही कल्पवास की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। बारह वर्ष का अपना ही महत्व है। बारह वर्ष बाद ही कुम्भा पड़ता है। कल्पवास की पद्धतियाँ ी कुछ प्रांतों में न्नि-न्नि है। कुछ लोग पौष पूर्णिमा से और कुछ लोग मकर संक्रानित से इसे प्ररम्भा करते हैं। गंगा अपने आप में प्राणदायनी है। यह मोक्ष की संमवाहिका मानी जाती है। गंगाजल पीने मात्र से ही पापियों का पाप नष्ट हो जाता है। ‘गंगा तत दर्शनात मुक्ति’ गंगा के दर्शन मात्र से मोक्ष की कल्पना की गयी है। गोस्वामी तुलसीदास ने दरस परस मुख मजुन पाना हरहि पाप कह वेद पुराना' कहकर गंगा के महत्व को दर्शाया है। यही कारण है कि पतित पावनी गंगा के तट पर रहकर लोग एक मास पर्यन्त उसके जल का सेवन करते हैं और उत्तरायण सूर्य के सानिध्य में रहते हैं। संतों का दर्शन एवं उपदेश से ज्ञान की प्रापित करते हैं। यह एक प्रकार से अपने शरीर के अंदर व्याप्त विकारों को दूर करने के लिए भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से अपने शरीर का कायाकल्प करते हैं। यही कल्पवास का वास्तविक लक्ष्य है। कल्पवासियों को एक वर्ष ऐसा कार्य करने की पूरी ऊर्जा मिल जाती है। साथ ही जो कुछ ी ज्ञान-भघ अिैर वैराग्य के बारे में जानकारी होती है उसे वह प्रत्येक गाँवों में जाकर र-र में फैलाते हैं। यह एक प्रकार से ारतीय संस्कृति के वाहक बनते हैं। संगम का क्षेत्र, अक्षय क्षेत्र कहलाता है। यहाँ किया हुआ धर्म-कर्म हमेशा अक्षय रहता है उसका क्षय नहीं होता है। यही कारण है कि सदियों से यह परम्परा अविचिछन्न रूप से चली आ रही है। महज नदियों का नहीं, आस्था, दर्शन, अध्यात्म और विविध संस्कृतियों का अनूठा-सा संगम है तीर्थराज प्रयाग का मामेला। महीन र के लम्बे स्नान पर्व को संगम तट पर रहकर कल्पवास करने का पौराणिक और आध्यातिमक रूप से विशेष महत्व है।

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