Thursday, November 23, 2017
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 naga jhund

क्या आप जानते हैं नागा साधू भी श्रंगार करते हैं ? नारी को ही हमेशा सुनना पड़ता है कि उसे श्रंगार में कितना वक्त लगता है। नारी तो सोलह श्रंगार करती है लेकिन नागा साधू सत्रह श्रंगार करते हैं। नागा साधू शब्द सुनने से नहीं लगता कि वह श्रंगार भी करते हैं। हां वह श्रंगार के लिए किसी तरह के प्रचलित कास्मेटिक्स का प्रयोग नहीं करते। उन्हें भी अपने स्टाइल और लुक्स की परवाह है। नागाओं के विशेष श्रंगार साधन हैं , जो आम आदमी को जैसा भी लगे नागाओं को बहुत पसंद है।

नागा सन्यासी रोज सुबह नहाने के बाद शरीर पर ताजी भस्म लगाते हैं। यह भस्म कपड़ों की तरह उनके शरीर की रक्षा करता है। नागा साधूओं को सबसे ज्यादा प्रिय है भस्म क्योंकि भगवान शिव भी औघड़ रूप में धुनी रमाते हैं इसलिए शैव संप्रदाय के नागा साधू भी प्रिय भस्म को शरीर पर लगाते हैं।

नागाओं के व्यकितत्व का अहम हिस्सा है चिमटा। उनके लिए चिमटा रखना अनिवार्य है। यह औजार भी है हथियार भी और कभी कभी तो यह सन्यासी भक्त को अपने चिमटे से ही आर्शीवाद देते हैं। कहा जाता है कि यदि नागा सन्यासी के चिमटे से किसी को आर्शीवाद मिल जाए तो उसकी सारी परेशानी दूर हो जाएगी।

जैसे आम इंसान अपने बालों की देख भाल करता है वैसे ही नागा साधू अपने जटाओं की देख भाल करते हैं। मोटी मोटी जटाओं को सन्यासी पहले काली मिटटी से धोते हैं फिर धूप में सुखाते हैं। नागा अपने जटाओं को सजाते भी हैं। कुछ फूलों से ,कुछ रूद्राक्ष से तो कुछ मोतियों की माला से।

जटा की तरह ही दाढ़ी भी नागाओं की पहचान होती है। जटा की तरह दाढ़ी की भी देख रेख की जाती है।

नागा साधू अपने नाम के अनुसार कपड़े नहीं पहनते लेकिन कुछ नागा लंगोट धारण करते हैं। उसका एक कारण तो यह है कि भक्तों को नागा साधू के पास आने में झिझक न हो। दूसरा हठयोग के तहत भी कुछ नागा लंगोट धारण कर लेते हैं जैसे चांदी की लंगोट ,लोहे की लंगोट , लकड़ी की लंगोट।

अपने पहचान और शकित के प्रतीक तिलक पर नागा विशेष ध्यान देते हैं। तिलक लगाने की शैली को वह एक ही रखते हैं। हर रोज तिलक एक जैसा ही लगे इसके लिए नागा बहुत मेहनत करते हैं। 

कुछ नागा साधू रत्नों की मालाएं भी धारण करते हैं जैसा मूंगा ,पुखराज ,माणिक आदि महंगे रत्नों की मालाएं। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि उनका धन से लगाव है। इन महंगे रत्नों की मालाएं तो उनके श्रंगार का हिस्सा है।

नागा साधू , साधू होने के साथ ही साथ युद्ध कला में भी माहिर होते हैं। अतैव इनके साथ हथियार तो होंगे ही। नागा साधू तलवार , फरसा या ति्रशूल अपने साथ लेकर चलते हैं। 
भगवान शिव शेर की खाल को वस्त्र की तरह पहनते हैं। ठीक इसी तरह नागा सन्यासी भी हिरण या शेर की खाल पहनते हैं।

कुछ नागा साधू नियमित रूप से अपने आपको फूलों से सजाते हैं। यह अपने गले में फूलों की माला पहनते हैं। हाथों पर भी फुलों की माला लपेटते हैं। अपने जटाओं को भी फूलों से सजाते हैं।

नागाओं को रूद्राक्ष भी बेहद पसंद हैं क्योंकि कहा जाता है कि रूद्राक्ष भगवान शंकर के आंसुओं से उत्पन्न हुआ है। शिव के प्रतीक रूद्राक्ष की माला को लगभग सभी शैव नागा धारण करते हैं। इन मालाओं को बरसों तक सिद्ध किया जाता है। 

इस महा कुंभ में आपको ऐसे श्रंगार किये हुए नागा साधू दिख जाएंगे। हां हर रोज हर नागा साधू श्रंगार नहीं करते लेकिन थोड़ा बहुत श्रंगार तो अवश्य करते हैं। विशेष दिनों पर इनका श्रंगार देखने लायक होता है और कुभ तो ऐसा ही एक विशेष अवसर है न। कल आपके सामने नागाओं के जीवन की एक और कहानी होगी।

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