Thursday, November 23, 2017
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amavasya snan

मौनी अमावस्या पर छलकेगा धरती पर आकाश का अमृत
मोक्ष का द्वार खोलेगी मौनी अमावस्या
भक्त और भगवान का होगा मिलन

मौनी अमावस्या शाही स्नान का मुहूर्त : माघ मास कृष्ण पक्ष अमावस्या तिथि शनिवार दोपहर 2:32 से प्रारम्भ होकर रविवार दोपहर 12:52 तक रहेगी, उदिया तिथि में अमावस्या रविवार को होने के कारण मौनी अमावस्या का शाही स्नान रविवार, 10 फरवरी को होगा। अनेक वर्षों बाद ऐसा शुभ अवसर आया है जब मौनी अमावस्या पर ग्रह नक्षत्र कल्याणकारी भूमिका में हैं जो मानव की हर कामना को पूर्ण करेंगे।

पूरे कुम्भ का सबसे महत्वपूर्ण एवं पुण्यदायक पर्व मौनी अमावस्या माना गया है। ग्रहराज सूर्य और ग्रहरानी चन्द्रमा का मिलन मकर राशि में अमावस्या के दिन होने से प्राणदायनी उर्जा का सृजन जल में होता है। प्रयाग, संगम के अक्षय क्षेत्र में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के सानिध्य में स्नान, दान, जप, तप न केवल स्वास्थ्यवद्र्धक होता है बलिक पापों का क्षय कर स्नानकर्ता को मोक्ष का हकदार बनाता है। इस बार कुम्भ 2013 मौनी अमावस्या पर विशेष दुर्लभ ग्रह सिथति का सृजन हो रहा है जिससे त्रिवेणी में डुबकी लगाने से आत्मबल में वृद्धि, बीमारियों से छुटकारा, पापों का क्षय तथा मनोकानाएं पूर्ण होंगीं।


mauni kundali
(मौनी अमावस्या की सूर्योदयकालीन कुण्डली, ग्रह सिथति)

मौनी अमावस्या पर उच्च राशि तुला का शनि सहित राहु संयोग, सूर्य चन्द्रमा के साथ शुक्र का संचरण, शुक्र, मित्र शनि की राशि मे, बुध शनि की कुम्भ राशि में, शुक्र-शनि का राशि परिवर्तन राजयोग। अनेक वर्षों बाद ऐसा शुभ अवसर आया है जब मौनी अमावस्या पर ग्रह नक्षत्र कल्याणकारी भूमिका में हैं जो मानव की हर कामना को पूर्ण करेंगे। मौनी अमावस्या का स्नान-दान इस बार विशेष पुण्यदायक रहेगा। कुम्भ में यह दुर्लभ ग्रह सिथति होने पर मौनी अमावस्या का पुण्य प्रताप कई गुना बड़ गया है। मौनी अमावस्या कुम्भ का सबसे बड़ा स्नान पर्व है। मौन रहने से आध्यातिमक शक्तियों का विकास होता है, शरीर में ऊर्जा संग्रहित होती है। इस तिथि को चुपचाप मौन रहकर मनुनियों के समान आचरण पूर्ण स्नान करने के विशेष महत्व के कारण ही माघमास, कृष्णपक्ष की अमावस्या, मौनी अमावस्या कहलाती है। शरीर के धुलने का नाम ही स्नान नहीं है, वास्तविक स्नान तो वाक संयम है और मौन ही वाक संयम होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमदभगवतगीता में वाकसंयम को तप की संज्ञा दी है। मौनव्रत से गंभीरता, आत्मशक्ती तिथा वाकशक्ती मिें वृद्धि होती है। मौन से तात्पर्य है बिना दिखावे के सेवा करना। मौन रहना सभी गुणों में सर्वोपरि है। मौन का अर्थ है संयम के द्वारा धीरे-धीरे इंद्रियों तथा मन के व्यापार को संयमित करना। समस्त सिद्धियों के मूल में मौन ही है। जैसे निद्रा से उठने पर शरीर, मन एवं बुद्धि में नई स्फूर्ति दिखाई देती है वैसे ही मौन रहने पर सर्वदा वही स्फूर्ति शरीर के साथ मन एवं बुद्धि में बनी रहती है। जीवन भर लोभ, मोह, छल, कपट, काम, क्रोध, माया की दलदल में फंसा, कलियुग का श्रेष्ठ आधुनिक मानव कम से कम साल भर में मात्र एक दिन मौन व्रत धारण कर अपनी सूक्ष्म आन्तरित शक्तीयिों को पुन: संग्रहित कर सकता है। धर्मशालों के अनुसार इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनिपद प्राप्त होता है, जिससे अगले जन्म में व्रतकर्ता मुनि कहलाने का अधिकारी बनता है और अंत में ब्रह्रालोक प्राप्त कर लेता है। मौन व्रत रखने के धार्मिक लाभ होने के साथ ही व्यक्त किे आत्मबल की वृद्धि होती है। साथ ही साथ कम बोलने का अभ्यास भी सरलता से हो जाता है। इस दिन मौन व्रत धारण कर संगम के अक्षय क्षेत्र में स्नान दान, पूजा-पाठ आदि पुण्यकर्म विशेष फलदायक कहे गये हैं। पुराणों में मौनी अमावस्या की पावन तिथि में प्रयाग स्नान की जो अपार महिमा वर्णित है वह कालिदास के शब्दों में स्वर्ग तथा मोक्षदायनी है। मौनी अमावस्या के दिन श्रद्धालुओं को ब्रह्रा मुहूर्त में उठकर, मौनव्रत धारणकर त्रिवेणी स्नान करना चाहिए। स्नान के पश्चात अपने तीर्थपुरोहित को गाय आदि का निष्क्रय रूप में दान देना चाहिए। अगर हो सके, तो मौन व्रत का पालन, व्रत कर्ता को पूरे दिन करना चाहिए।

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