Friday, November 17, 2017
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kumbh rain

इसे बदइंतजामी का महाकुंभ कहा जाए तो गलत नहीं होगा। समय समय पर शिविरों में आग लगने की घटनाएं , उससे हुई मौतें। मौनी अमावस्या पर मेला क्षेत्र की बदइंतजामी किसी से छुपी नहीं है। इस दिन मेले में भी एक से ज्यादा भगदड़ मचे लेकिन प्रशासन ऐसी किसी घटना से इंकार कर रही है। फिर इलाहाबाद जंक्शन पर हुए हादसे में 36 लोगों की जान चली गई और प्रशासन तथा रेलवे एक दूसरे पर आरोप लगाता रह गया। इतना सब होने के बाद प्रशासन की नींद खुल गई और अंतिम शाही स्नान पर काफी चाक चौबंद व्यवस्था हुई। स्नान सकुशल निपट गया। निपटता भी क्यों नहीं जहां लगभग दो करोड़ लोगों के आने का अनुमान था वहां सत्तर लाख ने ही डुबकी लगाई। साफ है कि लोग कुंभ में आने से डर रहे थे। पुण्य कमाने की इच्छा सबमें होती है लेकिन अपनी जान देकर नहीं।

शुक्रवार बसंत पंचमी के दिन दोपहर से ही पानी बरसना प्रारंभ हो गया। शनिवार रात तक बारिश होती रही। बारिश की बूंदें कभी जोर से तो कभी धीरे पड़ती। लेकिन 24 घंटे से अधिक समय तक पानी बरसता रहा और उजड़ गई कुंभ नगरी।

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खबर है कि कुंभ में 14-15 सौ करोड़ रूपये खर्च हुए हैं। 35 किलोमीटर में कुंभ नगरी बसाया गया। कुंभ मेले की सड़कों पर चकर्ड प्लेटें तो बिछाई गई लेकिन अनेक स्थानों पर केवल मिटटी पर ही चकर्ड प्लेटें बिछा दी गयी।बालू नहीं डाली गई जिससे कि कीचड़ हो गया और सड़कें दलदल बन गईं जिसमें फंसकर अनेक लोग गिरे और चोटिल हो गये। सड़कों पर पानी भर गया। यह तो सड़कों का हाल है।

kumbh rain destruction1

शिविरों के गेट उजड़ गये। मेले में लगाए गए बैनर और होर्डिंग जी जान से अपने आप को बचाने की नाकाम कोशिश करती दिखी। शिविरों में पानी घुस गया चाहे वह कल्पवासी का हो या साधू संतों का। करोड़ों खर्च करके बनाए गए अखाड़े उजड़ गए। अनेक साधूओं ने कुंभ नगरी को राम राम कहा और शनिवार को प्रयाग तथा जंक्शन पर भारी संख्या में साधू संत गाड़ी का इंतजार करते दिखे। वैसे शाही स्नान के बाद तो अनेक साधू संत चले जाते हैं परंतु इस बार वह गये नहीं भागे हैं। जाने और भागने में बहुत अंतर है।

कल्पवासियों की हालत तो बहुत ही खराब हो गई है। शिविर में पानी घुसने की वजह से खाने पीने के सामान के अलावा कपड़े ,लत्ते ,बिस्तर सब कुछ भीग गया। उन्हें या तो रात गीली बिस्तर पर गुजारनी पड़ी या खड़े खड़े। उस पर बिजली गुल। हालंकि प्रशासन का कहना है कि शनिवार रात को बिजली चालू कर दी गई और सावधानी बरतने के लिए ही शिविरों की बिजली बंद कर दी गई थी।

एक लाख शिविर में पानी भर गया। कितने तंबू गिर गये इसका हिसाब नहीं। तंबुओं के गिरने से कल्पवासी और साधू चोटिल हुए। चकर्ड प्लेटें धंस गईं। सैकड़ों टन राशन बरबाद हो गया। सेक्टर-6 ,सेक्टर-7 और सेक्टर-8 की हालत सबसे ज्यादा खराब है और यहीं सबसे ज्यादा कल्पवासी भी बसे हैं। सड़कों पर दिन भर वाहन फिसलते रहे। मेला क्षेत्र में राशन की दुकान में भी पानी घुस गया।

कुंभ हो या अर्ध कुंभ या माघ मेला प्रशासन आंख बंद करके लल्लू जी पर विश्वास करता है। इस बार भी कुंभ नगरी में टेंट लल्लू जी के ही लगाए गए। पता चला कि वाटरप्रूफ टेंट है लेकिन लल्लू जी एंड संस के वाटरप्रूफ टेंट ऐन मौके पर दगा दे गये। टेंट तो जगह जगह से टपकने लगा। कल्पवासी पन्नी और घर से लाए ति्रपाल से बचने की कोशिश करते दिखे।

15 फरवरी से पहले करोड़ों की लागत से बनाए गए भव्य पंडाल मेला क्षेत्र में नजर आते थे। अब केवल बांस बलिलयां ही नजर आ रही हैं। सेक्टर-6 में गंगेश्वरी मार्ग पर सिथत प्रभू कृपा दुख निवारण धाम और भगवान लक्ष्मी नारायण धाम अब पूरी तरह उजड़ गया है। दिल्ली के लक्ष्मणदास जी महाराज का पंडाल भी ढह गया है। सेक्टर-7 में गंगा सेवा अभियान का मुख्य द्वार उजड़ गया। अयोध्या शिविर का अशर्फी भवन तो पूरी तरह जमीन पर आ गया। सेक्टर-7,8 के अनेक भव्य पंडाल जमीन पर गिरे नजर आए। सेक्टर-9 में विधा भास्कर जी महाराज का पंडाल ध्वस्त हो गया। शिर्डी धाम के पंडाल में पानी भर गया। सेक्टर-11 में कथा मंडपम का गेट गिर गया। परेड गाउंड सिथत प्रेस कैम्पों में पानी भर गया।

सबसे ज्यादा नुकसान आनंद अखाड़े के शिविर में हुआ। शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का शिविर गिर गया। फिलहाल कुंभ की यही हालत है।

हर बार प्रशासन घटना के घट जाने का इंतजार क्यों करता है। मैं इस विवाद में नहीं पड़ना चाहती कि गलती किसकी है रेलवे या प्रशासन। मौनी अमावस्या पर स्टेशन की घटना घट जाने के बाद व्यवस्था दुरूस्त हुई। अब बीच में मेला उजड़ जाने के बाद क्या होगा। बसंत पंचमी के बाद मेला पहले जैसा नहीं रहता। लेकिन इस बार तो बिल्कुल खत्म ही हो गया। इसमें किसका दोष है। प्रशासन इसके लिए किसे दोषी ठहराएगी। तीन दिन पहले ही बसंत पंचमी पर मूसलाधार बारिश की चेतावनी मिल गई थी लेकिन प्रशासन ने क्या किया। मेला शुरू होने से पहले मेला प्रशासन इंतजाम के दावे करता रहा उसका क्या हुआ। करोड़ों रूपये सिर्फ कुंभ में लगाए गए। उससे ऐसा इंतजाम ? चेतावनी के बाद भी प्रशासन के पास वक्त था लेकिन प्रशासन तो घटना घटने का इंतजार कर रही थी।

असल में उत्तर प्रदेश की जनता पर राज करते करते प्रशासन को आदत पड़ गई है सभी घटना घट जाने के बाद जैसे तैसे उसे निपटा देने की। परंतु वह शायद भूल गये थे कि यहां बात उत्तर प्रदेश के जनता की नहीं , केवल भारत की भी नहीं सारे विश्व के जनता की थी क्योंकि यह किसी गांव का मेला नहीं बलिक दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक मेला था। इसमें सिर्फ भारतीय मीडिया ही नहीं संपूर्ण विदेशी मीडिया भी आई है। मेले की बदइंतजामी की खबर विश्व भर में फैल जाएगी।

प्रशासन का दावा है कि जल की निकासी के लिए पम्प लगाए गए हैं। बिजली आ गई है । बिजली के खंबों और तारों को ठीक किया जा रहा है। सड़कों पर हुए गडढों को भरने का काम प्रारंभ हो गया है । श्रद्धालु और कल्पवासी मेले को छोड़कर कहीं नहीं गये हैं। उन्हें पूरी सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। 15 फरवरी की रात से ही राहत कार्य प्रारंभ हो चुके थे जो अब भी जारी हैं।

प्रशासन की मानें तो वह उजड़े मेले को फिर से बसा देंगे लेकिन मेला तो बदरंग हो ही चुका है क्या उसका रंग फिर से लौटेगा।

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