Friday, November 17, 2017
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full moon
कल्पवासी कुम्भ प्रसाद के रूप में गंगाजल के साथ संगम की मिटटी लेकर होंगे विदा
(माघी पूर्णिमा, 25 फरवरी)
सोमवार की पूर्णिमा और मघा नक्षत्र का संयोग अति फलदायी

करोड़ों की आस्था और विश्वास का महापर्व कुम्भ के पवित्र माघ मास की सामपित, माघी पूर्णिमा के स्नान-दान के साथ होगी और इसी के साथ श्रद्धालुओं का एक माह लम्बा चला कल्पवास पूर्ण होगा। एक मास से संगम की रेती पर टिके कल्पवासी रेणुका प्रसाद (संगम की रेती) ले आस्था की नगरी से विदा होंगें। माघ मास की पूर्णिमा अर्थात माघी पूर्णिमा माघ स्नान पर्वों की श्रंखला का अंतिम स्नान पर्व है, इसके बाद महाशिवरात्रि का स्नान पर्व कुम्भ का अंतिम स्नान पर्व ही शेष रहेगा। वैसे तो हर पूर्णिमा का अपना अलग महत्व होता है, पर माघ पूर्णिमा की बात ही निराली होती है। इस दिन स्नान-ध्यान करने से मनोकामनाएँ तो पूर्ण होती ही हैं, साथ ही मोक्ष भी मिलता है।

snanत्रिवेणी स्नान विधि : मान्यताओं के अनुसार माघी पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से पूर्व जल में भगवान का तेज मौजूद रहता है, देवताओं का यह तेज पाप का शमन करने वाला होता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व जब आकाश में पवित्र तारों का समूह मौजूद हो उस समय नदी में स्नान करने से घोर पाप भी धुल जाते हैं। माघी पूर्णिमा के विषय में कहा जाता है कि जो व्यकित तारों के छिपने के पूर्व स्नान करते हैं, उन्हें उत्तम फल की प्रापित होती है, जो तारों के छिपने के बाद परन्तु सूर्योदय के पूर्व स्नान करते हैं, उन्हें मध्यम फल की प्रापित होती है। जो सूर्योदय के पश्चात स्नान करते हैं वे इस दिन उत्तम फल की प्रापित से वंचित रह जाते हैं, इसलिए इस दिन शास्त्रानुकूल आचरण करते हुए तारों के छिपने के पूर्व स्नान करने का विधान है। ऐसा माना जाता है कि माघ महीने की पूर्णिमा को ही कलियुग की शुरूआत हुई थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माघी पूर्णिमा के दिन स्नान करने से नर्क गमन से मुकित मिलती है और इस स्नानादि के पुण्य प्रताप से मनुष्य भवसागर को पारकर, विष्णु धाम में जगह पाता है। तीर्थगमित श्रद्धालु स्नानार्थी को सर्वप्रथम ''त्रिवेण्ये नम: ऐसा कहकर पुष्पांजलि समर्पित करनी चाहिए पश्चात ओमकार का उच्चारण करते हुए जल का स्पर्श करना चाहिए तदनन्तर इस मंत्र का उच्चारण करते हुए स्नान करें,
ओम नमो देव देवाय शिव कण्ठाय दणिडने। रूद्राय चाप हस्ताय चकि्रणे वेधसे नम:।।
गंगा यमुना सरस्वती च सावित्री गरीयसि।। संनिधानी मवन्त्वत्र तीर्थे पाप प्रणाशिनि।।
सर्वेषां तीर्थानां मंत्र एष उदाहयत:।।
माघ मास की पूर्णिमा को प्रात: स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का पूजन, पितरों का श्राद्ध कर्म, अक्षमर्थों को भोजन, वस्त्र तथा ब्राह्राणों को यथाशक्ति तिल, वस्त्र , कम्बल, गुड़, कपास, घी, लड्डू, फल, अन्न, स्वर्ण, रजत आदि का दान करें। पूरे दिन व्रत का पालन कर ब्राह्राणों को भोजन कराने के बाद कथा-कीर्तनकर दूसरे दिन प्रस्थान करना चाहिए। यह तिथि गंगा स्नान के लिए शास्त्रों में फलदायिनी कही गई है। ब्राह्राणों को भोजन कराने का महात्म्य व्रत करने से ही होता है। माघ पूर्णिमा को बत्तीसी पूर्णिमा व्रत भी कहते हैं। पूर्णिमा के दिन प्रात:काल तिलों से स्नान किया जाता है। पुत्र और सौभाग्य की प्रापित के लिए मध्याह्न में भगवान शंकर की पूजा की जाती है। माघ मास में शीत ऋतु की समापित हो जाती है और बसंत ऋतु का आगमन प्रारम्भ हो जाता है और चारों ओर मौसम सुहावना हो जाता है। इस मास की पूर्णिमा के दिन यज्ञ, तप तथा दान का विशेष महत्व है। इस दिन गंगा स्नान करने से मनुष्य की समस्त बाधाएँ दूर हो जाती हैं। ऐसा विधान है कि इस दिन खरबूजे के बीज से बने लड्डू के भीतर सोने या चाँदी के आभूषण छिपाकर ब्राह्राण को दान स्वरूप दिया जाता है। इस दिन काले तिलों से हवन और काले तिलों से ही पितरों को तपर्ण करना चाहिए। इससे पितरों की अतृप्त आत्मा को शांति मिलती है। मकर संक्रानित के समान ही माघ पूर्णिमा के दिन तिल के दान और तिल से बने खाधन पदार्थों के सेवन का विशेष महत्व माना जाता है। माघ पूर्णिमा का व्रत करने से सुख-सौभाग्य, धन-संतान तथा स्वास्थ्य आदि में वृद्धि होती है। संगम के अक्षय क्षेत्र में माघी पूर्णिमा का स्नान, यज्ञ, जप-तप-व्रत, दानादि का विशेष महत्व है। संगम के तट पर एक महीने का कल्पवास की अवधि पूर्णकर कल्पवासी माघ पूर्णिमा के दिन स्नान, गंगा पूजन, आरती, हवनादि कर पूरे माघ महीने किए गए कल्पवास, साधना, जप-तप-व्रत, दान, तपस्या की पूर्ति स्वरूप गंगा माता की रेणुका प्रसाद के रूप में लेकर फिर अगले वर्ष जीवनदायिनी गंगा मैया की गोद में आने की प्रार्थना कर अपने-अपने नगर ग्राम के लिए प्रस्थान करते हैं।

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