Wednesday, November 22, 2017
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holy places

गर्मी की छुट्टियों में जब मैं हास्टल से घर लौटी तो दूसरे ही दिन मेरे माता-पिता ने सूचित किया कि वे लोग कुछ दिनों के लिए बाहर रहेंगे। वे लोग केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री यमुनोत्री के अलावा अन्य तीर्थ स्थानों का भ्रमण करते हुए ऋषिकेश लौटेंगे। तत्पश्चात ऋषिकेश में कुछ दिन विश्राम करके घर वापस लौटेंगे। मैंने यह अपने मन से ही सोच लिया कि मैं भी इस यात्रा में सम्मिलित हूं। उन्होंने बात स्पष्ट की कि मैं साथ नहीं जा रही हूं।

उनके साथ जाने वालों की सूची में घर के दो पुराने लगभग साठ वर्ष के नौकर, घर के स्थाई पंडित जी यानी पुरोहित जी, महराज जी के पिता जी और कुछ रिश्तेदार, जो आर्थिक रूप में कमजोर थे। मैंने थोड़ा प्रतिरोध किया तो मेरे पिताजी का उत्तर था- पहले तुम पढ़ाई-लिखाई समाप्त करो, बाद में जाना। यानी उनके एक वाक्य का स्पष्ट उत्तर हमारे लिए कोर्ट जैसा फरमान होता था। लेकिन मेरा रोष तब दोगुना हो गया, जब पता चला कि मेरे माता-पिता ही इन लोगों का पूरा या आंशिक खर्च भी वहन करेंगे। मेरे विद्रोही मन में क्रोध के साथ ईष्र्या भी घर कर गई। लेकिन यह वह समय था, जब बच्चे माता-पिता से प्रश्न नहीं पूछते थे और विद्रोह करना तो लगभग देशद्रोह के समान ही माना जाता था। मैं शांत हो गई। अपने कमरे में जाकर रोई और थोड़ा दिल को सुकून मिला। पुन: साहस बटोर कर मैंने मां से आखिर पूछ ही लिया कि मुझे इस प्रकार छोड़ने का क्या औचित्य है? उनका उत्तर था कि अभी तुम्हारी उम्र तीर्थयात्रा की नहीं है। मैं चुप लेकिन मन के प्रश्न को उन्होंने पढ़ लिया और बोली- जब तुम लोग छुट्टियों में आते हो तो हम लोग तुम्हें घुमाने ले जाते हैं या नहीं? हम लोग लगभग हर ग्रीष्मावकाश में मसूरी जाते थे। लेकिन छोटी हो का क्या अर्थ? पाठको, तब मैं बारहवीं कक्षा की वार्षिक परीक्षा देकर आई थी। क्या आज यह वाक्य हम बारहवीं पास वयस्कों से कह सकते हैं?

इतने वर्षो बाद मुझे यह घटना एकाएक तब याद आई, जब मैंने उत्तराखंड में प्रकृति का विनाशकारी रौद्र तांडव नृत्य देखा। तब रहस्योद्घाटन हुआ कि आखिर वे लोग मुझे क्यों नहीं ले गए थे। चौबीसों घंटे चलने वाले समाचार चैनलों ने जो दृश्य दिखाए, उसने मेरे माता-पिता के इस विचार को प्रस्थापित किया कि हर चीज का समय और आयु होती है। मैं देखकर हैरान हो गई कि इन तीर्थ यात्रियों में कम उम्र के माता-पिता के साथ गोदी तक के बच्चे थे। लगभग हर आयु के लोगों को देखा जा सकता था। मैं सोचने लगी कि आखिर इतने छोटे बच्चों को लेकर माता-पिता तीर्थ यात्रा पर गए ही क्यों? जो बच्चे गोदी के थे, वे शायद यह घटना भूल जाएं, लेकिन जिनकी इमप्रेशनेबल एज यानी अतिसंवेदनशील उम्र थी, क्या वे कभी इस आघात से निकल पाएंगे? यदि निकल भी गए तो क्या कभी उनको ये दृश्य पुन: उभर कर विचलित नहीं करेंगे?

हमारे पूर्वजों ने जीवन के जो चार पन अर्थात अवस्थाएं ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास निर्धारित की थी, उसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण व सामाजिक कारण भी रहा होगा। यह उत्तराखंड की घटना इस सिद्धांत को कितना सत्य स्थापित करती है। पहले तीर्थ यात्राएं वानप्रस्थ अवस्था में पहुंचने पर की जाती थीं। मोटे तौर पर इसे यूं कहा जा सकता है कि ब्रह्मचर्य सिखाने या शिक्षा-दीक्षा का काल, गृहस्थ-पारिवारिक दायित्व का, वानप्रस्थ सांसारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होकर तीर्थाटन करने और संन्यास धीरे-धीरे मानसिक स्तर पर जीवन की यात्रा का सिंहावलोकन और स्वयं को मुक्त करने का काल माना जा सकता है। यह व्यवस्था प्रकृति का संरक्षण भी करती थी। कैसे? इसका सीधा-सा अर्थ था कि ऐसे स्थानों पर एक निश्चित संख्या, सीमा और आयु के लोग पहुंचें। यानी भीड़ कम, भीड़ कम तो गंदगी कम, प्रकृति का दोहन कम, प्रकृति का दोहन कम तो प्रदूषण कम। यदि समाज एक निश्चित स्थिर किए हुए दायरे में चलता है तो प्रकृति भी साथ देती है वरना अतिशय का जब बांध टूटता है तो उत्तराखंड जैसे विनाश से जूझना पड़ता है। वर्षो से खड़ा केदारनाथ का मंदिर पहले भी न जाने कितने झंझावात, बाढ़ और बर्फ के तूफानों को झेल चुका था, लेकिन इस बार का अति नहीं झेल सका। केदारनाथ के गर्भगृह को छोड़ शायद कुछ नहीं बचा। जब भारी संख्या में तीर्थयात्रियों का पदार्पण होगा तो स्पष्ट है कि सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। जंगल कटेंगे, रास्ते बनेंगे, पानी लाया जाएगा और रुकने की व्यवस्था के लिए भवन निर्माण होगा। किसी मैदानी क्षेत्र में इस प्रकार की व्यवस्था करने के लिए पृथ्वी हिलती नहीं, किंतु पहाड़ों पर इसे करने के लिए पहाड़ों को काटना, हटाना सब करना पड़ता है। वह भी ब्लॉस्ट या धमाकों द्वारा। यानी संपूर्ण क्षेत्र का हिलना। यह कंपन अन्य बची चीजों को कमजोर बना देता है।

समस्या तब ज्यादा गंभीर हो जाती है, जब हम मनुष्य लोग इन चार अवस्थाओं को मिश्रित करने लगते हैं। अब तीर्थयात्रा की कोई सीमा रेखा नहीं। गोदी का बच्चा या खेलने-कूदने वाला बच्चा क्या समझेगा तीर्थयात्रा के महत्व को। उसके लिए तो वह एक प्रकार का घूमना ही होगा। लेकिन जब इन बच्चों के माता-पिता नहीं समझते, तब क्या कहा जाए? जरा सोचिए, आप प्रभु के समक्ष पूर्ण भक्ति भाव से आनंद विभोर खड़े हैं और गोदी का बच्चा रोने लगा। वह माता-पिता से बाहर जाने का हठ कर रहा है। यानी आपके भजन-पूजन में तो विघ्न पड़ा ही, साथ ही आपने दूसरों को भी विक्षुब्ध किया। इस प्रकार की तीर्थयात्राओं पर अपनी कच्ची गृहस्थी के साथ जाना कहां तक न्याय संगत है? ये तीर्थयात्राएं भगवत भजन, ध्यान, एकाग्रता तथा शांति के लिए की जाती हैं, लेकिन आप वहां भी गृहस्थी के जंजाल में फंसे खड़े हैं।

बच्चों के लिए अन्य स्थान हैं, जो दुर्गम नहीं। उन स्थानों का भ्रमण कीजिए और बच्चों को उनके उस परिपक्त वय तक पहुंचने के लिए छोड़ दीजिए। आजकल एक फैशन-सा हो गया है कि जिसे देखो, वह कुंभ के समय गंगा स्नान के लिए भागा चला जा रहा है। इतने बड़े जन समुद्र को नियंत्रित करना अपने आप में एक जादूगर के करिश्मे जैसा ही कहा जाएगा। इस अवसर पर यदि कुछ अनहोनी घटित होती है तो हम तलवार खींचकर तुरंत व्यवस्था पर आक्रमण कर देते हैं। कृपया अपने आपको कठघरे में खड़ा करके स्वयं से प्रश्न कीजिए कि आपने इस अव्यवस्था में मीडिया का भी थोड़ा दोष है। टीवी पर एक महिला गुस्से से बोल रही थीं कि हमें यहां लाकर डाल दिया, अब न जाने कब बस आएगी। सरकार को जरा भी हम लोगों की परवाह नहीं यानी आपने उन सारी ताकतों को एक साथ धुलवा दिया, जो दिन-रात एक करके अपने जीवन को खतरे में डालकर आपको बचाने में लगे हुए हैं।

किसी बुद्धिमान ने इस वाक्य की रचना की होगी। सारे तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार। यानी गंगा सागर एक बार ही जाना चाहिए। जिसने भी यह कहा, वह दूरद्रष्टा भी था। वहां भी यात्रियों के इतने कदम पड़ने लगे हैं कि मानो सागर रूठ गया है। समुद्र काफी दूर चला गया है। सहस्त्र धारा में अब अनेक धाराएं बहती दृषिटगत नहीं होतीं, मात्र एक पतली-सी धारा दिखती है और अगल-बगल का जंगल तो मानो हवा में कहीं विलीन हो गया है।

ऐसा नहीं कि मेरे पिताजी पुराने विचारों के थे। वह जब केदारनाथ पहुंचे, तब पता चला कि वहां शौचालय नहीं थे। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने अपने पंडे से कहा कि सीजन समाप्त होने के बाद वह घर आए, वह इसमें सहायता देंगे। पंडाजी महाराज सर्दियों के मौसम में पधारे। जो बजट बताया, पिताजी ने दिया। यह पहल मेरे पिता जी ने की थीं कुछ वर्षों बाद जब कुछ जान-पहचान के लोग केदारनाथ की यात्रा पर जा रहे थे तो पिताजी ने उन्हें बताया कि वह कृपया देखकर आएं कि वहां शौचालय बनवाए गए या नहीं, क्योंकि प्राय: ऐसी जगहों पर जहां बार-बार जाना संभव नहीं होता, पैसे का दुरूपयोग हो सकता है। रिपोर्ट सही आर्इ। पंडे ने बनवा दिए थे।

मेरे ख्याल से यदि हमारी भेड़ संस्कृति रही कि एक जा रहा है तो हम भी चल दें, तब हमारा कुछ नहीं हो सकता। मेरे विचार से सरकार को एक नीति बनानी चाहिए, जिससे इन संवेदनशील स्थानों पर मात्र निशिचत संख्या में ही लोग पहुंचे। इसमें आयु सीमा का प्रावधान जरूर रखा जाए। किंतु हमारे प्रजातंत्र का क्या होगा? झंडे लेकर अधिकारों के हनन के विरोध में लोग सड़कों पर उतर पडेंगे। लेकिन आखिर सऊदी अरब में वे लोग कैसे हज को नियंत्रित करते हैं। जितने भी देशों से हज यात्री जाते हैं, उन सभी देशों को एक निशिचत संख्या में ही यात्रियों को भेजने का प्रावधान है। यह ठीक भी है। यदि न हो, तब देखिए क्या आपाधार्इ मचेगी। हम भारतीय अधिकार मांगने में अग्रगण्य हैं, किंतु कर्तव्यों के पालन में पीछे। अधिकार के साथ अपने कर्तव्यों को समझिए – देश, पृथ्वी आपको तब सूद के साथ लौटाएगी। ये मेरे अपने निजी विचार हैं, यदि कोर्इ सहमत नहीं तो यह उनका अधिकार है, और मेरा अधिकार है कि मैं अपने विचार निर्भीकता से प्रकट करूं।

Comments 

 
#1 AL OK kumar pandey 2017-05-19 16:09
Nae8a
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