Friday, November 24, 2017
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asaram bapu1

ज्यादातर बाबा अपनी सफलता को इसी कसौटी पर कसते हैं कि उनके पास कितनी जमीन-जायदाद है, उनका आश्रम कितना भव्य है और उनके अनुयायियों में संपन्न लोगों की संख्या कितनी है। इसलिए जिस बाबा के जितने ज्यादा आश्रम हों, उसके आसपास का वातावरण जितना समृद्ध और भव्य हो, जो दरबान और अंगरक्षक रखता हो, उस पर उतना ही संदेह किया जाना चाहिए

 

       आसाराम बापू ने देश के सभी बाबाओं को लजा दिया है। ऐसा नहीं है कि उनमें से बहुतों का चरित्र कुछ अलग होगा, लेकिन जैसा कि चारा कांड के अपराधी लालू प्रसाद ने कहा है, जो पकड़ा गया वो चोर है। आसाराम एंड कंपनी कोई मामूली चोर नहीं हैं। बलात्कार या यौन शोषण की कोई एक घटना सामने आती, तब भी मामला कम शर्मनाक नहीं होता, परंतु यहां तो यौन शोषण की एक लंबी कड़ी दिखाई देती है। अगर राजस्थान की एक लड़की ने अपने अपमान को सार्वजनिक नहीं किया होता, तो आसाराम बापू आज भी उतने ही सम्मानित रहते जितना वे इसके पहले थे। ठीक ही कहा गया है, बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी।

       बात इतनी दूर तक चली गई है कि आसाराम को दो चुल्लू पानी में डूब मरना चाहिए था। कहते हैं, वे धार्मिंक आदमी हैं। अपने शिष्यिशष्याओं को वे धर्म की शिक्षा दिया करते थे। यदि आसाराम में रुपए में एक पैसा भी धर्म-चेतना होती, तो उनका मानसिक ब्रेकडाउन हो गया होता और वे फूट-फूट कर रो रहे होते। पश्चिमी देशों में तो ऐसी स्थिति में पकड़ लिए अनेक बाबाओं ने आत्महत्या कर ली है। जाहिर है, इसके लिए शर्म नाम की चीज चाहिए। हमारे देश में, या कहिए कि दक्षिण एशिया के सभी देशों में, शर्म उनको मगर नहीं आती। आसाराम नाम का यह बाबा अब भी अपने को बेकसूर बतला रहा है। क्या उसे पता नहीं है कि ऊंट को तौलिए से नहीं ढका जा सकता?

       हर अपराधी अपने को बेकसूर ही बतलाता है। यहां तक कि र्मडर करनेवाला अपराधी भी, चश्मदीद गवाह मौजूद होने के बावजूद, अपने को निर्दोष कहता है। बेशक वकीलों की चतुराई और कई बार जजों की अर्थ लिप्सा से कुछ बदमाश छूट भी जाते हैं, पर अधिकांश को तो सजा मिलती ही है। कानून के हाथ लंबे होते हों या नहीं, पर उसकी आंखों में खुर्दबीन लगा होता है। अपराध के मामलों में बहुत दिनों से मेरी राय यह रही है कि अपराधी को अपना बचाव बिलकुल नहीं करना चाहिए, अदालत के सामने अपनी गलती स्वीकार कर क्षमा मांगनी चाहिए रणनीति के तहत नहीं, बल्कि शुद्ध मन से। तब अदालत उसके साथ रियायत भी कर सकती है। आत्मग्लानि भी एक प्रकार का दंड ही है जो आदमी अपने को देता नहीं है, बल्कि जो उसके भीतर से पैदा होता है। लेकिन अपराध और दंड के बीच यह रिश्ता दुर्लभ है आज के जमाने में।

       इसलिए यह देख कर मुझे आश्र्चय नहीं होता कि न केवल आसाराम अपने को निर्दोष मान रहे हैं, बल्कि उनके अधिकांश अनुयायियों को भी लग रहा है कि उनके बापू को फंसाया गया है। गुजरात और राजस्थान में कई जगहों पर मोहभंग के शिकार कुछ अनुयायियों ने आश्रमों में तोड़-फोड़ की, पर इससे ज्यादा लोगों ने जेल के दरवाजे पर एकत्र हो कर आसाराम का समर्थन किया। यह प्रतिबद्धता का एक विचारहीन चेहरा है। लालू प्रसाद को जब जेल की लंबी नागरिकता दी गई, तब भी उनके समर्थकों और ओबीसीवादियों ने यही कहा कि लालू जी को फंसाया गया है। इससे पता चलता है कि अंध समर्थक या तो वाकई अंधे होते हैं या फिर अंधा होने का अभिनय करते हैं। जहां तक कम्युनिस्टों का सवाल है, उनमें दोनों लक्षण पाए जाते हैं। लेकिन कम्युनिस्टों को ही क्यों दोष दिया जाए, सभी विचारधाराओं या भाव धाराओं में ऐसा ही होता है।

       लिप्सा एक गंदी चीज है। इतनी गंदी कि वह शायद किसी को भी नहीं छोड़ती। यश की कामना एक तरह की लिप्सा ही है। बड़े-बड़े लोग भी इससे बच नहीं पाते। पारंपरिक समझ के अनुसार, लिप्सा के तीन कारण होते हैं- जर, जमीन और जोरू। कृषि व्यवस्था में जमीन का बहुत महत्व था। आजकल भी लोग दूसरों की जमीन हड़पने की कोशिश करते हैं, पर अब जमीन को जर में ही गिनना चाहिए। इस तरह, बचे दो- जर और जोरू। यहां जोरू का आशय पत्नी से नहीं है। किसी दूसरे की पत्नी से प्रेम किया जा सकता है- यह दुतरफा भी हो सकता है, लेकिन उसे हड़पा नहीं जा सकता। आशय स्त्री मात्र से है। जर और स्त्री की लिप्सा ने बड़े-बड़े अत्याचार कराए हैं। बलात्कार को इसी कोटि में रखना चाहिए।

       कई बाबा बलात्कार करते हैं, पर बहुतों को इसकी जरूरत नहीं होती। शिकार स्वयं चल कर उनके पास आते हैं। कुछ को लगता है कि उन्हें बाबा का विशेष आशीर्वाद प्राप्त है, ज्यादातर संकोच या शर्म वश किसी को कुछ नहीं बतलातीं। इस तरह यौन लिप्सा का खेल जारी रहता है। यह बात बहुत पुरानी न होती, तो भक्ति की अधिकांश धाराओं में स्त्री से दूर रहने का उपदेश नहीं दिया जाता। स्त्री ईश्वर की प्रतिद्वंद्वी है। साधु का मन ईश्वर में लगे रहना चाहता है, पर स्त्री को देख कर वह जमीन पर लोटने लगता है। स्पष्ट है कि स्त्री को सहना साधारण तपस्वियों के बस की बात नहीं है। परंतु यह समस्या स्त्री की नहीं, बाबा लोगों की है। कायदे से उनमें इतना संयम होना चाहिए कि वे वासना पर काबू पा सकें। इसीलिए महात्मा गांधी ने स्त्रियों को उनके घरों से निकाला और सार्वजनिक जीवन में ले आए। वे स्वयं भी स्त्रियों से घिरे रहते थे। पर किसी भी स्त्री ने यह दावा नहीं किया है कि गांधी ने उसकी ओर पापपूर्ण निगाह से देखा।

       बेशक जर पहले नंबर पर है। सच्चे साधु लक्ष्मी की माया में नहीं पड़ते। वे खुद सादगी से रहते हैं और दूसरों को भी सादगी से रहने की सीख देते हैं। लेकिन ज्यादातर बाबा अपनी सफलता को इसी कसौटी पर कसते हैं कि उनके पास कितनी जमीन-जायदाद है, उनका आश्रम कितना भव्य है और उनके अनुयायियों में संपन्न लोगों की संख्या कितनी है। इसलिए जिस बाबा के जितने ज्यादा आश्रम हों, उसके आसपास का वातावरण जितना समृद्ध और भव्य हो, जो दरबान और अंगरक्षक रखता हो, उस पर उतना ही संदेह किया जाना चाहिए।

साभार: राष्ट्रीय सहारा

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