Tuesday, November 21, 2017
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चेहरा आशा खेमका

उनके करीबियों के मुताबिक, मुश्किल चुनौती को योजनाबद्ध ढंग से आसान बनाने की कला कोई उनसे सीख सकता है।

                सार्वजनिक स्‍थल पर फिसल कर गिर जाना कोई ऐसी घटना नहीं है, जिसे लोग याद रखना चाहें।

हालांकि बर्फबारी देखने का वह उनका पहला ही अनुभव था। लेकिन जब वह गिरीं, तो उनकी समझ में आ गया था कि इंग्लैंड में आगे का सफर उनके लिए आसान साबित नहीं होने जा रहा। तब तो और भी, जब वह एक ऐसे देश में थीं, जहां की भाषा और संस्कृति वह बिल्‍कुल नहीं समझती थीं। लेकिन आज समूचा इंग्‍लैंड आशा खेमका को एक ऐसी महिला के तौर पर पहचानता है, जिसने हजारों ब्रिटिश युवाओं की जिंदगी बदल दी। इसी कारण उन्हें नाइटहुड के समतुल्य माने जाने वाले डेम कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एंपायर से सम्मानित किया गया।

                आशा खुद मानती हैं कि बिहार के एक छोटे से शहर सीतामढ़ी की एक साधारण-सी लड़की होने के नाते उनके लिए यह सब आसान नहीं था। तेरह की उम्र में उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा और जब उनका विवाह हुआ, तो वह महज 15 वर्ष की थीं। बीती सदी के अस्सी के दशक में जब वह अपने पति और तीन बच्चों के साथ इंग्लैंड पहुंचीं, तो उन्हें अंग्रेजी के एक लफ्ज की भी जानकारी नहीं थी। लेकिन यह उनका आत्मविश्‍वास ही था, जिसने उन्हें कमजोर नहीं पड़ने दिया। उन्होंने बच्चों के टेलीविजन शो और आस-पड़ोस की महिलाओं से बातचीत के जरिये अंग्रेजी सीखना शुरू किया। पर विधिवत पढ़ाई की अदम्य इच्छा उन्होंने तब तक दबाए रखी, जब तक उनके तीनों बच्चों ने स्कूल जाना शुरू नहीं कर दिया। पैंतीस की उम्र में दोबारा पढ़ाई शुरू करने के बाद जिस तरह उन्होंने तमाम सांस्कृतिक और भाषायी बाधाएं पार कीं, वे उनकी मानसिक दृढ़ता का परिचायक हैं। इतना ही नहीं, उनके नजदीकी लोगों की मानें, तो आशा एक बेहतरीन प्रबंधक हैं और मुश्किल चुनौती को योजनाबद्ध ढंग से आसान बना देने की कला कोई उनसे सीख सकता है। यही वजह है कि वेस्ट नाटिंघमशायर कॉलेज की प्रधानाचार्य और मुख्य प्रबंधक के तौर पर रोजगारपरक शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल विकास के क्षेत्र में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना कई बार ब्रिटिश सरकार ने की है। अपनी उपलब्धियों के लिए वह दुनिया के आकर्षण का केंद्र हैं, लेकिन आज भी उनका दिल भारत के लिए धड़कता है। वह मानती हैं कि संभावनाओं से भरे भारत में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं, जरूरत बस सोच को यथार्थ में बदलने की है।

साभार: अमर उजाला

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