Wednesday, February 21, 2018
User Rating: / 0
PoorBest 

 

 

 

 

saadhna

गायत्री तीर्थ शान्तिकुंज, हरिद्वार के संस्थापक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का मानना है की निर्वाह की आवश्यकता जुटाने, गुत्थियों को सुलझाने और प्रतिकूलताओं के अनुकूलन में माथा-पच्ची करते-करते मौत के दिन पूरे हो जाते हैं अभावों और संकटों से पीछा नहीं छूटता कई बार तो गाड़ी इतनी भारी हो जाती है कि खींचे नहीं खिंचती नीरस और निर्थक जीवन ऐसा अभिशाप है, जिसे दुर्भाग्य के रूप में स्वीकार करना पड़ता है साधारण जीवन का यही स्वरूप है, जो प्रतिकूल परिस्थितियों में तो अन्य प्राणियों से भी गया-बीता प्रतीत होता है

असामान्य जीवन इससे आगे की बात है सफल, समर्थ और समुन्नत स्तर के व्यक्ति सौभाग्यशाली दीखते हैं और उनकी स्थिति प्राप्त करने के लिए मन ललचाता है भौतिक सम्पन्नता से सम्पन्न और आत्मिक विभूतियों के धनी लोगों की न प्राचीन काल में कमी थी, न अब है पिछड़े  और समुन्नत वर्गों के व्यापक अन्तर देखने से आश्चर्य होता है कि एक जैसी काया में रहने वाले मनुष्यों के बीच इतना ऊंच और नीच होने का कारण क्या हो सकता है? स्रष्टा का पक्षपात और प्रकृति का अन्तर कहने से भी काम नहीं चलता, क्योंकि दोनों को सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित करने में कहीं रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है यह व्यतिक्रम रहा होता तो ग्रह-नक्षत्र अपनी धुरी पर न घूमते, परमाणुओं के घटक उच्छृंखलता बरतते और परस्पर टकराकर उसी मूल स्थिति में लौट गए होते, जिसमें महततत्व अपनी अविज्ञात स्थिति में अनन्त काल से पड़ा था फलस्वरूप न सृष्टि बन पाती और न एक दिन चलती-ठहरती यानी सब कुछ परिपूर्ण व्यवस्था के अनुरूप चल रहा है

फिर मनुष्यों के बीच अन्तर का क्या कारण है? इसका सुनिश्चित उत्तर यही है कि जीवन की उथली परतों तक ही जिनका वास्ता रहा उन्हें छिलका ही हाथ लगा किन्तु जिन्होंने नीचे उतरने की चेष्टा की, उन्हें एक के बाद एक बहुमूल्य उपलब्धि मिलती चली गई गहराई में उतरने को अध्यात्म की भाषा में साधना कहते हैं

साधना किसकी? इसका उत्तर है- जीवन की जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है, जो उसकी जितनी सदुपयोग साधना कर लेता है, वह उतना ही कृत-कृत्य हो जाता है. जीवन का मूल्य, महत्त्व और उपलब्धि न समझ पाना ही वह अभिशाप है, जिसके कारण गई-बीती परिस्थितियों में दिन गुजारने पड़ते हैं  इस भूल का परिमार्जन ही आत्मज्ञान है यह जागृति जब सक्रिय बनती है, तो आत्मोत्कर्ष के लक्षण तत्काल दृष्टिगत होने लगते हैं इसी आत्म परिष्कार की प्रक्रिया का नाम साधना है

 

 

 

 

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

Miscellaneous

Who's Online

We have 4237 guests online
 

Visits Counter

781724 since 1st march 2012