Saturday, November 25, 2017
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हर साल आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। उस दिन विभिन्न तबके के महिलाओं को सम्मानित किया जाता है, गोषिठयां होती हैं, भाषण दिया जाता है इत्यादि। विदेशों में भी महिला दिवस धूम धाम से मनाया जाता है। परंतु आज हम अपने देश की बात करेंगे।

 इस साल भी कर्इ महिलाओं को राष्ट्रपति ने सम्मानित किया, कर्इ शहरों में महिलाओं ने दौड़ लगार्इ, चुनाव सामने है तो नेताओं ने भी महिला दिवस की आड़ में महिला वोटरों को लुभाने की भरपूर कोशिश की। घर घर में इस दिन महिलाओं को खुश रखने की कोशिश की गर्इ, उन्हें आराम दिया गया।

साल में एक दिन भी राष्ट्रपति का महिलाओं को सम्मानित करना बहुत मायने रखता है परंतु क्या रोज मर्रा की जिंदगी में जन साधारण के द्वारा साल में एक दिन महिलाओं को सम्मान देना ही पर्याप्त है ? बचे हुए 364 दिन उन्हें बेइज्जत किया जाता है। उनके उपर अत्याचार होता है। महिलाएं बेफिक्र होकर सड़क पर निकल नहीं सकतीं। बेटी घर से निकलने के बाद जब तक घर नहीं लौटती तब तक घरवालों की चिंता दूर नहीं होती।

जब तक लड़की और लड़कों में भेद भाव दूर नहीं होगा तब तक महिला दिवस मनाने का कोर्इ अर्थ नहीं बनता। अभी भी ज्यादातर घर में लोग लड़की के जन्म पर दुखी और लड़के के जन्म पर खुश होते हैं, यह भेद भाव क्यों ? कहा जाता है लड़के से वंश चलता है, पिता माता का नाम रोशन होता है। क्या प0 नेहरू का नाम डूब गया, बेटा क्या इससे ज्यादा रोशन करता उनका नाम महिलाओं की मौजूदा हालात को देखते हुए महसूस होता है कि साल में एक दिन महिला दिवस मनाकर महिलाओं को खुश करने की कोशिश बच्चों को झुनझुना पकड़ाकर खुश करने के बराबर है।

आज भी ऐसा सोचा जाता है कि लड़का बुढ़ापे की लाठी होता है। पुराने जमाने की बात अलग थी, पर आजकल देखा जा रहा है कि वही लाठी मां बाप को पीटकर घर से निकालने में काम आ रही है और ऐसी सिथति में लड़की ही मां बाप का सहारा बनती है।

कन्या भ्रूण हत्या में कुछ कमी आर्इ है पर अभी यह समाप्त नहीं हुआ। लावारिस नवजात शिशु मिलने की घटनाएं आम हैं। माना जाता है कि इस तरह की घटनाएं ज्यादातर अविवाहित माता पिता की संतान के साथ होता है। इस तरह के बच्चों की पहचान समाज में नाजायज बच्चों के रूप में होती है। परंतु बच्चे कभी नाजायज नहीं होते , रिश्ता नाजायज होता है। देखा जाता है कि ऐसी घटनाओं में भी बचिचयां ज्यादा मिलती हैं। इसका मतलब है कि मां बाप जायज बेटी को भी फेंक देते हैं।

जब किसी परिवार में आर्थिक समस्या उत्पन्न होती है तो शिक्षा, हाबी, करियर सभी क्षेत्रों में  समझौते की बात आती है तो बहन को ही समझौता करना पड़ता है। चाहे बहन भार्इ से ज्यादा प्रतिभावान ही क्यों न हो।

यह तो कुछ उदाहरण मात्र हैं। महिलाओं पर अत्याचार की सूचि बनाने जाएंगे तो खत्म होने का नाम नहीं लेगी। कुछ अपवाद भी हैं। हमारे देश में भी कुछ लड़कियां अपनी पसंद की जिंदगी जी रही हैं और अपना करियर बनाने का उन्हें मौका मिल रहा है परंतु उनकी संख्या काफी कम है। लेकिन जिन लड़कियों को आगे बढ़ने का मौका मिलता है वह लड़कों को पीछे छोड़ रही हैं। जिंदगी के सभी क्षेत्र में जो पहले सिर्फ पुरूष के अधिकार में था वहां भी आज महिलाएं पुरूषों को पीछे छोड़कर अपने को प्रतिषिठत कर रही हैं। इससे मेल र्इगो हर्ट हो रहा है और महिलाओं को दबाने के लिए उनके उपर अत्याचार बढ़ रहा है। परंतु पुरूष आज सिर्फ पाशिवक शकित में महिलाओं से आगे है और इसी का प्रयोग करके वह महिलाओं को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।

 जिस देश में अधिकांश महिलाओं की हालत ऐसी है उस देश में वूमेंस डे का क्या मतलब । मैं अपने आस पास ही देखती हूं कि घर के पुरूष घर की महिलाओं को आठ मार्च के दिन हैप्पी वूमेंस डे कहते हैं और दूसरे ही दिन खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए महिलाओं पर अत्याचार करते हैं। तो फिर हैप्पी वूमेंस डे का क्या मतलब है। इसका मतलब महिलाओं को साल में सिर्फ एक दिन सम्मान पाने का हक है।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस तो आठ मार्च को साल में एक दिन ही मनाया जाएगा। परंतु भारत में महिला दिवस सही अर्थ में तभी मनेगा जब साल भर महिलाओं को पहले अपने घर में फिर समाज में इज्जत मिलेगी, पुरूष से अगर महिला आगे निकल जाए तो पुरूष मेल इगो को कंट्रोल में रखकर सिथति को सहजता से स्वीकार करेंगे, भार्इ - बहन को हर क्षेत्र में समान अवसर मिलेगा, दूध का ग्लास पहले बहन को दिया जाएगा, दहेज हत्या नहीं होगा, महिलाओं को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार मिलेगा, बचिचयों को दुनिया में आंखें खोलने दिया जाएगा और सबसे बड़ी बात साल के 365 दिन महिलाओं को इंसान समझा जाएगा तब आठ मार्च को भारत में  भी महिलाएं गर्व से महिला दिवस मनाएंगी।

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