Friday, November 24, 2017
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बच्चों में ऐसी आदत डालिए जिससे आप गर्व महसूस करें और आप का बच्चा दूसरों के लिए अनुकरणीय हो। बच्चे कच्ची मिटटी का धेला होते हैं जिसको आप जो आकार देंगे वह वैसे ही बनेंगे। आजकल कहा जाता है कि बच्चों को न डांटें लेकिन घर पर बच्चों को माता पिता से थोड़ी डांट पड़े तो कोई हर्ज नहीं। अपने बच्चे को स्वयं डांटें पर ऐसा न बनाएं कि दूसरों से डांट खानी पड़े।

 

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पहले जमाने में छोटे बच्चों को बाहर लेकर जाने में एक बहुत बड़ी समस्या थी। दूसरों के यहां जाकर बच्चे गीला कर देते थे। अब डाइपर ने यह समस्या हल कर दी है। इसलिए घर पर डाईपर न भी पहनाएं पर बाहर जाएं तो अवश्य पहनाएं। छोटे बच्चों को लेकर जब दो चार दिन के लिए बाहर जाएं तो उसके सारे जरूरी सामान और दवाईयां भी साथ ले लें। एक बार मेरे दूर के रिश्ते के देवर , देवरानी छोटी बच्ची को लेकर कुछ दिनों के लिए मेरे यहां आए थे। एक दिन रात के तीन बजे बच्ची के पेट में दर्द होने लगा और मेरी देवरानी ने मुझसे ग्राइप वाटर मांगा पर मेरे घर में ग्राइप पीने लायक कोई बच्चा नहीं था। बगल के घर में छोटा बच्चा था देवरानी ने उनसे ग्राइप वाटर मांगने के लिए कहा जो रात के तीन बजे संभव नहीं था।यह आदत बच्चे के लिए नहीं पर उसके मां के लिए जरूरी है। 

जैसे जैसे बच्चा बड़़ा होगा उसे प्यार के साथ साथ अनुशासित करना माता पिता का फर्ज है। इसके लिए बच्चे के बड़े होने का इंतजार न करें। जब वह बैठने लगे तभी से उसे अच्छी आदतें सिखाएं। यह बातें आपको किसी किताब में नहीं मिलेगी यह मैने अपने बुजुर्गों से सीखी है और अपने बच्चे पर जांचा परखा है।

बच्चों को खिलौनों से खेलना सिखाएं-

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बच्चों में एक आदत होती है सामने जो भी सामान मिले उसे पकड़ने की। इसलिए घरवाले कीमती या टूटने वाला सामान बच्चे की पहुंच से बाहर रखते हैं। ऐसा न करें जो सामान जिस जगह पर रहना चाहिए उसे वहीं रखें पर बच्चा जब उसे पकड़ने जाए तो उसे ना कहकर रोकें। बच्चे को इसी उम्र से हां और ना का फर्क समझाएं। दो चार बार ऐसा करने पर वह समझ जाएगा कि कौन सी चीज उसे पकड़नी है और कौन सी नहीं। बच्चे को उसके खेलने लायक खिलौना दें उसे खिलौने से खेलना सिखाएं घर के सामानों से नहीं। अगर आप कीमती या टूटने वाला सामान बच्चे की पहुंच से बाहर रखेंगे तो जब वह किसी के घर जाएगा तो उसकी पहुंच में जो भी सामान आएगा वह उसी से खेलना शुरू कर देगा। हो सकता है यह उस घर के लोगों को पसंद न आए। जब बच्चे को लेकर किसी के घर जाएं तो उसका दो चार खिलौना साथ ले जाएं जिससे वहां भी वह उसी से खेल सके। बचपन से बच्चों में यह आदत डालेंगे तो कहीं भी बच्चे के साथ जाएं आपको अच्छा माता पिता बनने के लिए तारीफें मिलेंगी।

बच्चों में खान पान की आदत-

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छ: महीने के बाद ही बच्चे बाहर का खाना शुरू करते हैं उस समय भी डाक्टर के कहे अनुसार ही बच्चे को खिलाएं। जब बच्चा नार्मल खाना खाने लगे जैसे दाल , चावल , रोटी , सब्जी इत्यादि तो नियम से उसे दोनो वक्त का खाना और नाश्ता टाइम से दें।अक्सर देखा जाता है कि बच्चे खाना नहीं खाना चाहते। इसके लिए बच्चों को अपने साथ डाइनिंग टेबल पर बैठाकर वही खाना खिलाएं जो आप खा रहे हों उसे उबला खाना न दें। इसके लिए आप रेगुलर भोजन कम तेल मसाले का बनाएं। कुछ विशेष गरिष्ठ भोजन खाने का मन हो तो अपने लिए अलग से बना लें। अक्सर देखा जाता है कि बच्चे को ड्राइंग रूम या बेड रूम में खाना खिलाया जाता है जहां पर टीवी चलता है। बच्चा टीवी देखते देखते खाना खाता है। यह आदत नहीं डालनी चाहिए। ऐसी आदत होने पर बच्चे दूसरे के यहां खाने पर जाकर यही करते है। हो सकता है उस घर का नियम अलग हो। बच्चे को सबके साथ डाइनिंग टेबल पर खाना दें। आपके खाने का टाइम अलग हो सकता है , ऐसी सिथति में अगर दादा , दादी या कोई और हो उनके साथ बच्चे को खिलाएं। अगर ऐसा कोई न हो तो खुद प्लेट में थोड़ा सा खाना लेकर बच्चे के साथ बैठें। किसी और को वही खाना खाते देखकर बच्चा खा लेगा। जब बच्चा दो ढ़ाई साल का हो जाए तो उसे अपने हाथ से भोजन करना सिखाएं। इससे उसे अंदाजा होगा कि उसे कितना खाना चाहिए और वह बदहजमी का शिकार कम होगा।

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जब बच्चा चार पांच साल का हो जाए तो उसे सभी तरह का खाना दें जिसमें पिज्जा , बर्गर, नूडल्स वगैरह फास्ट फूड खीर ,आइसक्रीम ,मिठाई , फल सब कुछ हो पर जंक फूड न हो। यह सब घर पर बनाएं या किसी बड़े दुकान से लाएं। ऐसा कभी नहीं होना चाहिए कि आपका बच्चा किसी दूसरे के घर जाकर कोई खाध पदार्थ देखकर सोचे कि यह तो घर में नहीं देखा और ललचाकर ज्यादा खाए। चित्र में आपको बर्गर खाता हुआ जो बच्चा दिख रहा है बच्चों को ऐसे ललचाकर , घर में खाना चाहिए दूसरों के घर पर नहीं।

यह सारी आदतें बच्चे के छोटे होने पर यह कहकर नजर अंदाज किया जाता है कि यह तो बच्चा है। लेकिन यही बच्चा एक दिन बड़ा होता है और बचपन में पड़ी आदतें बड़े होने के साथ साथ पुख्ता होती जाती हैं और तब यही आदतें सबको खटकती हैं।फलस्वरूप आप भी बुरे मां बाप बन जाते हैं।

बच्चे को सच बोलना सिखाएं- बच्चे बड़ों की नकल करते हैं। इसलिए अपने आपको सुधारें। मां बाप एक दूसरे से कुछ न छुपाएं , झूठ न बोलें। बच्चे के सामने तो किसी भी परिसिथति में किसी से भी झूठ न बोलें।स्वयं को बचाने के लिए बच्चों से किसी को झूठ बोलने के लिए न कहें।

अक्सर माओं की आदत होती है पापा से बच्चों की गलती छुपाना। ऐसा कभी न करें बलिक बच्चों से कहें कि पापा के सामने स्वयं अपनी गलती कबूलें। पापा को भी चाहिए डांटने के बजाए बच्चों को समझाएं और उसे यह अहसास दिलाएं कि गलती कितनी भी बड़ी क्यों न हो सच बोलने से सजा या तो कम होती है या माफ। बच्चा तो गलती करेगा ही पर जब वह जानेगा कि सच बोलने से उसे ज्यादा सजा नहीं मिल रही है तो वह सच बोलने से कतराएगा नहीं।

बच्चों में हीन भावना न पनपने दें- बच्चे जब स्कूल जाने लगते हैं तो उसके साथ अमीर घर के बच्चे भी पढ़ते हैं। जिनकी जीवन शैली आपके बच्चे से मेल नहीं खाती और बच्चा हीन भावना से ग्रस्त हो सकता है। उसे समझाएं कि उसके पापा की हैसियत क्या है और अभी उसे पापा की हैसियत के अनुसार ही जीना है। बच्चों को समझाएं कि उन अमीर बच्चों से आगे बढ़ने का एक तरीका है - अमीर बच्चों को पढ़ाई लिखाई , खेल कूद , सांस्कृतिक गतिविधि में पीछे छोड़ दें। आज ऐसा करने पर भविष्य में भी उन अमीर बच्चों से उनकी हैसियत बड़ी होगी। बच्चों को बराबरी करने से तभी रोका जा सकता है जब माता पिता खुद अमीर रिश्तेदार ,दोस्तों की बराबरी न करें।

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छुटपन से ही बच्चों में अच्छी आदत डालने के लिए और एक योग्य संतान के अभिभावक कहलाने के लिए माता पिता को अपनी आदतें बदलनी पड़ेंगी। बच्चे के साथ जितना हो सके समय बिताएं। छोटे बच्चे के साथ खुद भी बच्चे बनिये और जैसे जैसे बच्चा बड़ा हो उसका दोस्त बनें। बच्चे के पसंद नापसंद का भी ख्याल रखें। खुद टीवी के सामने बैठकर बच्चे को कमरे में जाकर पढ़ने के लिए न कहें। जब बच्चा पढ़े तो स्वयं भी टीवी न देखें। इससे बच्चे पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है। जब बच्चा देखेगा कि माता पिता उसके लिए अपनी खशी का बलीदान दे रहे हैं तो वह भी उनकी खातिर कुछ बनने की सोचेगा और आपका सपना पूरा होगा। याद रखें कि बच्चे के जन्म के साथ ही माता पिता का भी जन्म होता है।

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