Saturday, November 25, 2017
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PoorBest 

mom friend

आजकल की अधिकांश मांएं यह मानती हैं कि वे अपने बच्चे की सबसे अच्छी दोस्त हैं। लेकिन उनकी सही परवरिश के लिए क्या उनका दोस्त बनना ही काफी है? क्या आपको लगता है कि आपका बच्चा आपसे कुछ ज्यादा फायदा उठा रहा है? अपने बच्चे से किस तरह से आप बेहतर तरीके से जुड़ सकती हैं, आइये, जानते हैं -

                पिछले दिनों एक खबर आई थी कि मुंबई और बैंगलुरु में चौबीस घंटे के ऐसे चाइल्ड केयर सेंटर शुरू हुए हैं, जहां आप अपने बच्चे को पूरे 24 घंटे से लेकर दस दिन तक छोड़ सकती हैं। ऐसे सेंटर में अपने छोटे बच्चे को सप्ताह भर के लिए छोड़ कर कई दंपती देश-विदेश घूम आते हैं।

                बाल मनोचिकित्सक डॉंक्टर रवींद्र भट्ट मानते हैं कि आज की पीढ़ी के अभिभावक पहले की अपेक्षा ज्यादा कन्फ्यूज्ड हैं। उन्हें एक स्तर पर अपनी आजादी चाहिए और वे महसूस करते हैं कि अपने बच्चों को भी पूरी आजादी देंगे। अब पहले की तरह पेरेंट्स और बच्चों के बीच जनरेशन गेप नहीं रहा। बच्चे माता-पिता का खौफ नहीं खाते। माता-पिता कोशिश करते हैं कि अपने बच्चे के साथ दोस्ताना व्यवहार करें। बचपन से वे उन्हें बताते हैं कि हम तुम्हारे सिर्फ पेरेंट्स नहीं, सबसे अच्छे दोस्त हैं। लेकिन सच यह है कि अभिभावक अपने बच्चे के सिर्फ दोस्त बन कर नहीं रहना चाहते। वे भी रिश्ते में एक बारीक लकीर चाहते हैं, जहां बच्चे उनकी सुनें, उनकी परवरिश पर उंगली ना उठाएं।

                अमेरिका के कैलिफोर्निया प्रांत में हाल ही में अभिभावक और बच्चों के रिश्तों पर एक सर्वेक्षण हुआ। इसमें पाया गया कि लगभग 53 प्रतिशत आठ से चौदह साल के बच्चे अपने माता-पिता को एक दोस्त की तरह नहीं, बल्कि एक गाइड की भूमिका में देखना चाहते थे। डॉंक्टर रवींद्र मानते हैं कि हमारे यहां भी स्थिति कमोबेश यही है। शहर और गांव के बच्चों की परवरिश में फर्क है। शहर में खुलापन है। पिता का व्यवहार बदला है। लेकिन बच्चों की दिक्कतें एक-सी हैं। बच्चे अपने माता-पिता को ना बहुत दब्बू देखना पसंद करते हैं और ना ही आक्रामक।

पापा और दोस्त

                दिल्ली के दस साल के मोहित खुराना अपने पिता से बेहद प्यार करता है। पापा उसे बैडमिंटन क्लास, स्विमिंग क्लास ले जाते हैं। फिल्म भी वो पापा के साथ देखता है। पर उसे लगता है कि पापा को अपने दूसरों के सामने अपनी जुबान पर काबू करना चाहिए। पापा अक्‍सर उसे भी गाली दे कर बात करते हैं। और जब वह उनसे उस शैली में बोलता है तो वो नाराज हो जाते हैं। गाजियाबाद की बारह साल की अनुष्का को लगता है कि उसकी मां उसके हर काम में जरूरत से ज्यादा दिलचस्पी रखती हैं। वह कब किससे चैट कर रही है, किस दोस्त से फोन पर बात कर रही है, स्कूल में क्या हुआ, यह सब जानना चाहती है। अनुष्का को लगता है कि उसकी अपनी भी एक जिंदगी है और उसमें वह मां को शामिल नहीं करना चाहती। आजकल के अधिकांश बच्चों की यही सोच है। वे चाहते हैं कि माता-पिता उनके ऊपर हर समय हावी ना रहें। पढ़ाई को ले कर उन पर ज्यादा दबाव ना बनाए।

                डॉंक्टर रवींद्र कहते हैं, ‘पेरेंट्स को यह ध्यान रखना होगा कि वे अपनी सीमा कहां तक की रखें। बच्चों के साथ कम्युनिकेशन गैप ना हो, इसके लिए उनसे लगातार बात करना, उनकी क्रिया-कलापों के बारे में जानना जरूरी है। यह तय अभिभावक को ही करना पड़ेगा कि वह बच्चों से किस हद तक दोस्ताना संबंध रखे और कहां उनको उनकी सीमा बताए।

बच्चों को करीब लाने की 5 तरकीब

1. अपने बच्चे का स्वभाव बदलने की कोशिश न करें: आपका बच्चा इंट्रोवर्ट या एक्स्ट्रोवर्ट हो सकता है। अगर आपका बच्चा चुपचाप रहता है तो उससे यह अपेक्षा करना कि वह सबके साथ दोस्ताना व्यवहार करेगा, गलत है। उसी तरह एक्स्ट्रोवर्ट बच्चे बाहर वालों से जल्दी घुल-मिल जाते हैं और घर के कई राज भी खोल देते हैं। उनसे यह उम्मीद न कीजिए कि आपके कहने पर वे चुप रहना शुरू कर देंगे। अगर वे अपना स्वभाव बदलने की कोशिश करेंगे तो उनके व्यक्तित्व पर इसका विपरीत असर पड़ेगा।

2. समय दें: अपने बच्चे से कभी यह न कहें कि बाद में बात करते हैं, अभी मैं व्यस्त हूं। उनके साथ पूरा वक्त बिताएं। बच्चा अगर अपनी कोई बात आपसे साझा करना चाहता है, तो उसी समय सुनें और अपनी राय दें। इससे बच्चे के सामने आपकी विश्वसनीयता भी बढ़ जाएगी।

3. प्यार जताएं: आपकी झप्पी और दुलार बच्चे को आपके करीब लाएंगे। बच्चे ने कोई अच्छा चुटकुला सुनाया है तो उसे प्यार से झप्पी दें, पप्पी दें। बच्चे इससे सुरक्षित और वांछनीय महसूस करते हैं।

4. आशावादी सोच: आपके बच्चे से अगर कोई काम बिगड़ गया है तो आप उस पर ना बिगड़े। बच्चे के प्रति हमेशा पॉजिटिव सोच रखिए। उसे बातों-बातों में हौसले और प्रेरणादायक कहानियां सुनाइए।

5. तनाव से रखें दूर: बच्चे बहुत जल्द तनाव में आ जाते हैं। उनके अंदर यह भावना भी होती है कि कहीं मम्मी-पापा नाराज ना हो जाएं। वे अपनी तरफ से आपको खुश रखने की कोशिश करते हैं। उन पर इतनी अपेक्षा ना लादें कि वे तनाव में आ जाएं।

बच्चों से दूरियां मिटाएं, ये 5 कारगर उपाय

परिवार के साथ छुट्टियां मनाएं और बाहर घूमने जाएं।

घर के नियमों को सख्त न बनाएं और इन्हें बनाने में बच्चों की राय भी लें।

घर के बड़े-बुजुर्गों के साथ पर्व-त्योहार मनाएं और बच्चों को उसमें शामिल करें।

बच्चों की शिक्षा को लेकर ज्यादा परेशान न हों और उनकी भी राय इसमें जरूर लें।

बच्चों को दोस्त बनाने के लिए प्रेरित करें और उन्हें अपनी एक दुनिया बनाने दें।

इमोशनल हेल्थ भी जरूरी

                बच्चों की डॉक्टर दीपा सिंह इमोशनल हेल्थ पर ज्यादा बल देती हैं। उनका मानना है कि माता-पिता बच्चे से किस तरह का रिश्ता रखते हैं, इसका असर बच्चे की भावनाओं पर पड़ता है। अगर बच्चा बहुत उग्र है, बात-बात पर रोता है, दब्बू या डरपोक है, छोटी-छोटी बातों पर नर्वस हो जाता है तो इसके लिए माता-पिता को अपने अंदर झांकना होगा। उनके ही किसी बर्ताव की वजह से बच्चे में ये लक्षण नजर आने लगते हैं। दीपा बताती हैं कि उनके पास एक अभिभावक अपनी नौ साल की बेटी को लेकर आए थे, जो अक्‍सर बिस्तर गीला कर देती थी, बहुत गुस्सा करती थी। दीपा ने बच्चे को दवाई तो दी, पर जब उससे बात की तो पता चला कि जब भी माता-पिता उसके सामने झगड़ा करते थे, वह डर जाती थी। गुस्सा करना उसका डिफेन्स मैकानिस्म था। जैसे ही पेरेंट्स ने अपना व्यवहार बदला, उसके सामने झगड़ना छोड़ दिया, वह सामान्य हो गई।

                माता-पिता का बच्चे को बात-बात पर पुच्ची देना, गोद में उठाना या बिलकुल प्यार ना करना भी बच्चे को विद्रोही बना देता है। बच्चे के सामने किस तरह की भाषा बोलें, आपकी बॉडी लेंग्वेज और आपका बर्तावये सब आपको या तो उनके पास ले जाएगा या उनसे दूर कर देगा।

साभार: हिन्दुस्तान अनोखी

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