Friday, November 24, 2017
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अमृता अग्रवाल

(प्रधानाचार्या संस्कार इंटरनेशनल स्कूल)

 

इलाहाबाद। दिसम्बर 2013 में संस्कार इंटरनेशनल स्कूल की प्राचार्या श्रीमती अमृता को शिक्षा के क्षेत्र में उनके विशेष योगदान के लिए सम्मानित किया गया। नर्इ दिल्ली की योग कनफेडरेशन संस्था ने उन्हें ‘किरण अचीवमेंट अवार्ड’ से पुरस्कृत किया है।

इलाहाबाद लाइव्स की विशेष संवाददाता ने अमृता अग्रवाल की इस उपलब्धि व उनकी आगे की योजनाओं को लेकर बात की।


        सवाल-15 साल से शिक्षा के क्षेत्र में चलते हुए ‘किरण अचीवमेंट अवार्ड' तक पहुंचना कैसा लग रहा है।

        जवाब-कभी सोचा नहीं था लेकिन बचपन से ही लीडरशिप अवार्ड मिलता रहा। मैं हमेशा से लिव फार टुडे के सिद्धान्त पर जीती आर्इ हूं। सेल्फ लर्निंग का कांसेप्ट काम करता गया। रास्ते अपने आप खुलते चले गये।

        सवाल-इस अवार्ड के लिए आपका चुनाव किस तरह हुआ।

        जवाब-छटें नेशनल वूमेन एक्सीलेंस अवार्ड 2013 के अन्तर्गत ‘द एजुकेशनल लीडरशिप कैटेगरी’ में यह अवार्ड मुझे दिया गया है। एनजीओ की ओर से 16 देशों के विभिन्न शहरों में एक सर्वेक्षण कराया गया था। ये पुरस्कार महिलाओं को अलग-अलग क्षेत्रों में उनके विशिष्ट योगदान के लिए दिया जाता है। संस्था ने अपने सर्वे में सुलेम सरांय जैसे पिछड़े सुविधाहीन इलाके में बेहतर शिक्षा के लिए हमें चुना।

        सवाल-अमृता जी! ग्रेजुएशन के बीच में ही आपकी शादी हो गर्इ थी ऐसे में इस तरह का काम कैसे मुमकिन हुआ।

        जवाब-मैंने लव मैरिज की है। सेकेंड इयर में ही शादी हो गर्इ। असल में संस्कार इंटरनेशनल स्कूल में प्राचार्या के पद की जरूरत पड़ी और अचानक ही मुझे इस पद की बागडोर संभालनी पड़ी। आर्इ नेवर प्लान। जो सामने आता गया, उससे गुजरते हुए यहां पहुंची, अभी तो और आगे जाना है।

सवाल-तो क्या ये समझा जाये कि शिक्षा के क्षेत्र ने आपको चुना।

जवाब-बेशक! स्कूल की जरूरत ने मुझे यहां बिठा दिया। जिस दिन इस पद के लिए कोर्इ और योग्य मिल जायेगा। मैं आगे बढ़ जाऊंगी। मानिटरिंग फिर भी मेरी ही रहेगी।

        सवाल-बहुत कम ऐसा होता है कि शादी के बाद कोर्इ महिला शिक्षा अर्जित करे और फिर एक मिसाल!

        जवाब-बिल्कुल! मेरे साथ पार्टनर का साथ-सहयोग पूरी तरह रहा। परिवार का भी पूरा पोजिटिव सपोर्ट मिला। हां थोड़ी बहुत अड़चने तो आम होती ही हैं। समझौता किया, ऐसा मैं नहीं कहूंगी क्योंकि जब रास्ता मैने चुना, यहां मैं हूं तो उस सब के लिए केवल मै ही जिम्मेदार थी। केवल सकारात्मक नजरिया रखकर चलिए तो राह आसान हो जाती है।

        सवाल-घर और स्कूल के बीच मैनेजमेंट कैसे करती हैं।

        जवाब-मेरा टाइम मैनेजमेंट शुरू से ही स्ट्रांग रहा है। मेरी दो बेटियां हैं। अब तो बड़ी हो गर्इ हैं। उन्हें पता है कि तीन बजे से रात नौ बजे तक मेरा वक्त पूरी तरह उनके लिए हैं। सुबह 10-30 बजे तक मुझे स्कूल पहुंचना ही होता है।

        सवाल-आज की शिक्षा के बारे में क्या कहेंगी।

        जवाब-मेरी शुरू से ही यही कोशिश रही है कि शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित किया जाये। कंटेंट पर नहीं, नालेज पर ध्यान देने की जरूरत है। स्कूल में फंला चेप्टर टीचर ने कैसे याद कराया था, ये याद रह जाता है, क्या याद कराया था, अक्सर हम भूल जाते हैं। शिक्षा किताब में नहीं होती। इस क्षेत्र में चुनौतियां बढ़ी हैं। केवल डिग्री ले ली और हो गया ऐसा नहीं चलेगा। बच्चों में व्यकितत्व विकास करने का वक्त है। विषय पर बच्चे की रूचि बढ़ानी है, माइंड डेवलप करना है। शिक्षक को 40 मिनट के पीरियड में ये भी देखना है कि अमुक बच्चा सामाजिक रूप से कितना भागीदार है। कोर्स भी आगे बढ़ाना है इसलिए बच्चों और शिक्षक के बीच इंटरेक्शन ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।

        सवाल-भविष्य की क्या योजनाएं हैं। क्या कुछ विशेष प्रयास भी जारी है।

        जवाब-इंदिरा एजुकेशनल कंसलटेंसी दिल्ली के ट्रेनिंग प्रोग्राम की मैं सीर्इओ हूँ। हबीबपुर में पॉलीटेक्निक कोलेज खोला जायेगा। कार्य चल रहा है। पूरा मैनेजमेंट देखूंगी। लीडरशिप स्किल्स पर वर्कशाप आयोजित किये जा रहे हैं। इसका एक सकारात्मक परिवर्तन देखा जा रहा है। बच्चों के अंदर ये भाव आने लगा है कि हमें आगे चलना है, टीचर हमारे पीछे हैं ही, वे हमें सम्भाल लेंगे। प्राथमिकताएं बहुत क्लियर होनी चाहिए। शिक्षक के प्रति उनमें विश्वास बढ़ा है।

        सवाल-चिन्मय मिशन-युवा केन्द्र से भी जुड़ी है।

        जवाब-जी, 13 साल से 18 साल के बच्चों के व्यकितत्व विकास का प्रयास हैं। उन्हें भारतीय समाज के नैतिक मानवीय मूल्यों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यूथ का समर्पण भी हमें इसमें देखने को मिल रहा है। 

        सवाल-जिंदगी की चुनौतियों को लेकर आप का क्या फंडा है।

        जवाब-लोग कहते हैं कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। मैं कहती हूं क्या खोया। जब आपको पता है कि आपने इसका चुनाव किया, आप यहां अपनी मर्जी से हैं तो खोना या समझौता करना कैसा। खोना और पाना इज इन द माइंड। लक्ष्य की ओर बढ़ें लेकिन नजर अपनी जमीन पर भी रहे। पावर आफ स्पीच पर यकीन रखती हूं। वेल्यू ट्रेनिंग पर जोर होगा।

        सवाल-आपने हाल ही में फेसबुक पर डिफरेंटली एबल बच्चों की शिक्षा के लिए किसी पिटिशन पर हस्ताक्षर किया है।

        जवाब-जी, मेरा मानना है कि ऐसे लोग अपने आप को समाज से कटा क्यों महसूस करें। हो सकता है शारीरिक रूप से अक्षम ऐसे लोगों में म्यूजिक, गायकी या फिर इस तरह की कोर्इ और खासियत मौजूद हो। उन्हें एक सही प्लेटफार्म, एक सही दिशा दी जा सकती है। पार्लियामेन्ट को ऐसे लोगों के लिए सामान्य रूप से समाज से जोड़े रखने के लिए कोर्इ प्रावधान आवश्य करना चाहिए।

        सवाल-शिक्षा के क्षेत्र में इतना सब कुछ करना है, प्रेरणा कहां से मिलती है।

        जवाब-अपने अंदर से, कोर्इ व्यक्ति विशेष नहीं है, इसके पीछे वैसे भी ये क्षेत्र इतना व्यापक है, बहुत कुछ है अभी करने को।

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