Friday, November 24, 2017
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delhi protest

दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड की शिकार उस वीर युवती की मौत हो चुकी है। पूरे देश में , आज महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों पर इंसाफ पाने की लौ जल उठी है। लगातार चौदह दिन से दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन हो रहा है। दो व्यकित अनशन पर बैठे हैं। प्रदर्शनकारी अपनी जगह पर सही हैं लेकिन किसी पुराने कानून को बदलकर नया कानून बनाने में वक्त तो लगता ही है। मैं प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बिल्कुल नहीं हूं। मैं भी एक महिला हूं और घर के बाहर भी एक सुरक्षित जिंदगी चाहती हूं। लेकिन नया कानून बनाने के लिए जो वक्त लगेगा वह तो हमें सरकार को देना ही होगा और सरकार का रवैया कहीं से भी नकारात्मक नहीं लगता। हां कहीं कहीं पुलिस का रवैया अवश्य नारात्मक होता है। परंतु पुलिस के रवैये से हमेशा सरकार की मंशा को समझने की कोशिश हमें नहीं करनी चाहिए। सरकार को नये कानून के लिए समय देने का मतलब यह नहीं कि जनता सो जाए उन्हे अपना विरोध जारी रखना पड़ेगा।

बलात्कार के खिलाफ कड़ी से कड़ी सजा की मांग हो रही है। परंतु बलात्कार की घटना में कमी आना तो दूर दिनों दिन बढ़ती जा रही है। टीवी न्यूज पर एक के बाद एक उन खबरों को सुनते समय यही लगता कि न्यूज में बलात्कार पर अलग सेक्शन बना दिया गया हो। बलात्कारी पुरूषों का कोई जमीर नहीं है। उनका जमीर मर चुका है। कई दिन पहले पुणे में एक छह: वर्षीया बच्ची को दरिदों ने अपना शिकार बनाया।उसके अगले दिन ही बंगलूरू में एक सात वर्षीया बच्ची को अपनी इज्जत गंवानी पड़ी। जिसे इज्जत की सही परिभाषा भी नहीं मालूम। नोयडा के काल सेंटर में कार्यरत एक 22 वर्षीया युवती की लाश अर्धनग्न हालत में घर के पास सड़क पर पड़ी मिली। शुक्रवार रात को नौ बजे डयूटी खत्म होने के बाद वह कुछ अन्य महिला कर्मचारियों के साथ घर जाने के लिए निकली। थोड़ी दूर साथ आने के बाद सभी अपने अपने घरों की तरफ चले गये। जब दस बजे तक वह युवती घर नहीं पहुंची तो घरवालों ने तलाश शुरू की और पुलिस के पास गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने गये लेकिन पुलिस ने' जवान लड़की है बाय फ्रेंड के साथ भाग गई होगी कहकर उनको भगा दिया। शनिवार सुबह उस लड़की की लाश जिस अवस्था में मिली उससे रेप के बाद कत्ल की आशंका जताई जा रही है। इसकी पुषिट पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही होगी। अगर पुलिस रात को ही कार्यवाई करती तो हो सकता है कि युवती बच जाती। लापरवाही के आरोप में रविवार को पुलिसकर्मियों पर कार्यवाई हुई और पुलिस ने दो आरोपियों को पकड़ा भी है। काश पुलिस घटना घटने से पहले यह काम करती तो नोयडा पुलिस की जय जयकार हो जाती।

बहरहाल देश की इस सिथति में भी बयानबाजी का दौर तेज है। कुछ बयानों से लगता है कि सारा दोष लड़कियों का ही है। एक बुजुर्ग हस्ती के अनुसार बलात्कार भारत में नहीं बलिक इंडिया में होते हैं। उनके अनुसार इंडिया और भारत अलग है। इंडिया शहर है जहां पाश्चात्य सभ्यता पनपती है और भारत गांव है। इस बयान के बाद किरण बेदी ने कहा की सब गांव में थाना खोलकर देखिये। उस बुजुर्ग ने यह भी कहा कि महिलाओं को घर के अंदर काम करना चाहिए। उनके अनुसार पत्नी को घर देखना चाहिए और पति को कमाना चाहिए। तो हम तालीबान को गलत क्यों कहते हैं। 

जिस लड़की की शादी न हुई हो और घर में अकेले वही कमाने वाली हो तो वह क्या करे। उस बुजुर्ग के बयान का अर्थ है कि बलात्कारी पुरूषों को वहशीपन का जन्म सिद्ध अधिकार है ।वह तो खुले आम घूमेंगे ,लड़कियां उनकी शिकार बनती रहेंगी। 

इस समस्या का समाधान शुक्रवार को जी टीवी पर आने वाले धारावाहिक हिटलर दीदी में हुआ। हिटलर दीदी की एक किरदार लेडी इंस्पेक्टर जारा खान ने कहा कि फसाद की जड़ तो पुरूष हैं तो लड़कियों के बाहर जाने पर पाबंदी क्यों ? घरवालों को शाम के बाद लड़कियों को नहीं पुरूषों को घर से निकलने नहीं देना चाहिए। यह डायलाग आज हर भारतीय नारी के दिल की बात है। काश अगर ऐसा कानून बन पाता!

एक नेता ने कहा कि मर्यादा लांघने पर ही सीता हरण होता है। तो क्या सीता मैया ने भी मर्यादा लांघी थी , अगर हां तो उन्हे पूजा क्यों जाता है।मर्यादा और लक्ष्मण रेखा में बहुत अंतर है। सीता मैया ने लक्ष्मण रेखा पार की थी और आज भी लड़कियां लक्ष्मण रेखा पार कर रहीं हैं मर्यादा नहीं। इस बयान से विवाद होते देख नेताजी ने बयान वापस ले लिया। लेकिन कहते हैं कि कमान से निकला तीर और जबान से निकली बात वापस नहीं होती। औपचारिक रूप से उस बयान का कोई आधार नहीं है पर उस जनाब के दिल की बात तो सबके सामने आ ही गई।

बयानबाजी जो भी हो हकीकत यह है कि महिलाएं घर में कैद होकर नहीं रह सकतीं।उन्हे पूर्ण रूप से स्वतंत्र ,सुरक्षित और खुशहाल जिंदगी चाहिए। चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। कुछ साल पहले किरण बेदी ने कहा था कि लड़कियों को अपनी सुरक्षा के लिए लाइसेंसी रिवाल्वर मिलना चाहिए। उस वक्त इस बयान का विरोध भी हुआ था । आज के परिपेक्ष्य में यह बात सही लग रही है पर यह तो संभव नहीं। इसके जगह लड़कियों को कुछ अन्य उपाय करने पडें़गे जैसे पेपर स्प्रे ,लाल मिर्च पाउडर , कांच का पाउडर , ब्लेड हमेशा अपने बैग में रखें। जब भी अकेले निकलें माबाइल पर सौ नंबर निकालकर रखें ताकि कुछ भी महसूस हो तो आसानी से सिवच आन कर सकें। नंबर खोजने में वक्त बर्बाद न हो और नंबर डायल करते हुए कोई देख भी न पाए। इन सबके अलावा सबसे जरूरी है आत्मरक्षा अर्थात मार्शल आर्टस सीखें ।

बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने बिहार के सभी स्कूल कालेजों में छात्राओं के लिए मार्शल आर्टस का प्रशिक्षण प्रारंभ करने की घोषणा की है। कुछ अन्य राज्य भी इस ओर कदम बढ़ा रहे हैं। ओलिंपिक में कांस्य पदक विजेता महिला मुक्केबाज एमसी मेरी कौम के अनुसार मार्शल आर्टस केवल एक स्पोर्टस नहीं बलिक प्रतिकूल परिसिथतियों में मार्शल आर्ट महिलाओं की रक्षा भी करता है ।लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए इसकी ट्रेनिंग अवश्य लेनी चाहिए।

समाज का एक हिस्सा आज भी यह मानने को तैयार नहीं की महिलाओं में भी दम है। लेकिन आज की लड़कियां चीख चीखकर कह रही है हम किसी से कम नहीं यहां तक की जन्म से पहले भी।

neveha
अमरीका के रैंडी दम्पति की बच्ची नेवेहा का जन्म 9 अक्तूबर 2012 को हुआ। बच्ची के पिता ने डेलिवरी की लाइव रिकार्डिंग की। बच्ची अभी गर्भ में थी। उसका सिर्फ एक हाथ बाहर आया था और उसी हाथ की नन्ही नन्ही उंगलियों ने डेलिवरी कराने वाले डाक्टर की उंगली कस कर पकड़ ली। सभी इस बात से चकित हो गये। बच्ची चाहे अमरीकी हो या भारतीय , है तो वह लड़की ही। जो जन्म से पहले ही दुनिया को यह समझा रही है कि मुझको कम न समझो।

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