Friday, November 24, 2017
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valentines day 14 feb

इलाहाबाद। विदेशी संस्कृति से निकला वैलेंटाइन डे आज पूरे देश की संस्कृति में रचने बसने लगा है। प्रेम के इज़हार को लेकर नए-नए तरीके तलाशे जा रहे है। केवल समर्थन ही नहीं इस दिन का कुछ कटटरपंथी संगठन विरोध भी करते है। इसी कड़ी में साधु संतों ने भी कहा कि एक दिन का प्रदर्शन करने वाला प्रेम हमारी परंपरा नहीं है।

जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि का मानना है कि प्रेम पवित्र और संयत तत्व है हम इसके बिना नहीं रह सकते हैं। उनके अनुसार प्रेम व्यकित की उच्चतम साधना है जो इसकी मर्यादा को संभालकर रख सकता है वही प्रेम कर सकता है। इस संदर्भ में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का मानना है कि कर्म व विचारों को आत्मा की ऊंचाई तक पहुंचाना ही प्रेम है। शिव और गंगा की तरह जिसने भी प्रेम की मर्यादा का पालन किया वह अमर हो गया। महामंडलेवर श्री महंत कैलाशानंद ब्रहमचारी कहते हैं कि प्रेम में भाव पक्ष की प्रधानता आवश्यक है। प्रेम बिना जीवन संभव नहीं है लेकिन न तो इसे परिभाषा की सीमा में बांधना उचित है और नहीं इसे दर्शन बनने देना।

परमार्थ निकेतन की साध्वी भगवती सरस्वती का मानना है कि प्रेम मन तथा भावना की दूरियां मिटाने का भाव है। उनके मुताबिक जब ऐसी दृषिट बन जाए कि मैं और हम का भेद न रहे, उसे सच्चा प्रेम कहेंगे। जैसी हम अपनी चिंता करते हैं वैसी ही किसी और की करने लगे तो कह सकते हैं कि उससे प्रेम करते हैं। संन्यासिनी अखाड़े की अध्यक्ष दिव्यागिरि कहती हैं कि प्रेम अंतस का भाव है जिसके लिए कोई दिन नहीं निर्धारित किया जा सकता है। प्रेम का देह से कोई नाता नहीं है। जिसे हर पल प्रेम चाहिए वही इसका असली मर्म समझ सकता है। प्रेम का अर्थ ऐसी शानित है जो किसी से बात करके उससे मिलकर या उसे देखकर मिल सकती है।

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